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Rigveda Mandal 5 / Sukta 22 / Mantra 2

87 Sukta
4 Mantra
5/22/2
Devata- अग्निः Rishi- विश्वसामा आत्रेयः Chhanda- स्वराडुष्निक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
न्य१॒॑ग्निं जा॒तवे॑दसं॒ दधा॑ता दे॒वमृ॒त्विज॑म्। प्र य॒ज्ञ ए॑त्वानु॒षग॒द्या दे॒वव्य॑चस्तमः ॥२॥

नि । अ॒ग्निम् । जा॒तऽवे॑दसम् । दधा॑त । दे॒वम् । ऋ॒त्विज॑म् । प्र । य॒ज्ञः । ए॒तु॒ । आ॒नु॒षक् । अ॒द्य । दे॒वव्य॑चःऽतमः ॥

Mantra without Swara
न्य१ग्निं जातवेदसं दधाता देवमृत्विजम्। प्र यज्ञ एत्वानुषगद्या देवव्यचस्तमः ॥

नि। अग्निम्। जातऽवेदसम्। दधात। देवम्। ऋत्विजम्। प्र। यज्ञः। एतु। आनुषक्। अद्य। देवव्यचःऽतमः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 14 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जो (देवव्यचस्तमः) पृथिव्यादिकों का धारण करने और अति तोड़नेवाला (यज्ञः) मिलने योग्य (आनुषक्) अनुकूलता से (अद्या) आज हम लोगों को (एतु) प्राप्त हो उस (ऋत्विजम्) ऋतुओं में यज्ञ करनेवाले के सदृश (जातवेदसम्) उत्पन्न हुओं में विद्यमान (देवम्) श्रेष्ठ गुण, कर्म्म और स्वभाववाले (अग्निम्) अग्नि को (प्र, नि, दधाता) उत्तमता से निरन्तर धारण करो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यज्ञ करनेवाले यज्ञ को पूर्ण करते हैं, वैसे ही अग्नि शिल्पविद्या के कृत्य की सिद्धि को पूर्ण करता है ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥