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Rigveda Mandal 5 / Sukta 22 / Mantra 1

87 Sukta
4 Mantra
5/22/1
Devata- अग्निः Rishi- विश्वसामा आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्र वि॑श्वसामन्नत्रि॒वदर्चा॑ पाव॒कशो॑चिषे। यो अ॑ध्व॒रेष्वीड्यो॒ होता॑ म॒न्द्रत॑मो वि॒शि ॥१॥

प्र । वि॒श्व॒ऽसा॒म॒न् । अ॒त्रि॒ऽवत् । अर्च॑ । पा॒व॒कऽशो॑चिषे । यः । अ॒ध्व॒रेषु॑ । ईड्यः॑ । होता॑ । म॒न्द्रऽत॑मः । वि॒शि ॥

Mantra without Swara
प्र विश्वसामन्नत्रिवदर्चा पावकशोचिषे। यो अध्वरेष्वीड्यो होता मन्द्रतमो विशि ॥

प्र। विश्वऽसामन्। अत्रिऽवत्। अर्च। पावकऽशोचिषे। यः। अध्वरेषु। ईड्यः। होता। मन्द्रऽतमः। विशि ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 14 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विश्वसामन्) सम्पूर्ण सामोंवाले (यः) जो (अध्वरेषु) यज्ञों में (ईड्यः) प्रशंसा करने योग्य (होता) दाता (विशि) प्रजा में (मन्द्रतमः) अतिशय आनन्द युक्त होवे उस (पावकशोचिषे) अग्नि के प्रकाश के सदृश प्रकाशवाले पुरुष के लिये (अत्रिवत्) व्यापक विद्यावाले के सदृश (प्र, अर्चा) सत्कार कीजिये ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक जनों का ही सत्कार करें, अन्य जनों का नहीं ॥१॥
Subject
अब चार ऋचावाले बाईसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निविषय को कहते हैं ॥