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Rigveda Mandal 5 / Sukta 21 / Mantra 3

87 Sukta
4 Mantra
5/21/3
Devata- अग्निः Rishi- सस आत्रेयः Chhanda- स्वराडुष्निक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वां विश्वे॑ स॒जोष॑सो दे॒वासो॑ दू॒तम॑क्रत। स॒प॒र्यन्त॑स्त्वा कवे य॒ज्ञेषु॑ दे॒वमी॑ळते ॥३॥

त्वाम् । विश्वे॑ । स॒जोष॑सः । दे॒वासः॑ । दू॒तम् । अ॒क्र॒त॒ । स॒प॒र्यन्तः॑ । त्वा॒ । क॒वे॒ । य॒ज्ञेषु॑ । दे॒वम् । ई॒ळ॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
त्वां विश्वे सजोषसो देवासो दूतमक्रत। सपर्यन्तस्त्वा कवे यज्ञेषु देवमीळते ॥

त्वाम्। विश्वे। सऽजोषसः। देवासः। दूतम्। अक्रत। सपर्यन्तः। त्वा। कवे। यज्ञेषु। देवम्। ईळते ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 13 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (कवे) विद्वन् ! जैसे (विश्वे) सम्पूर्ण (सजोषसः) तुल्य प्रीति के सेवन करनेवाले (देवासः) विद्वान् जन (देवम्) श्रेष्ठ गुणवाले (दूतम्) दूत के सदृश वर्त्तमान अग्नि को (अक्रत) करते हैं और (सपर्यन्तः) सेवा करते हुए जन (यज्ञेषु) सत्सङ्गों में श्रेष्ठ गुणोंवाले विद्वान् की (ईळते) स्तुति करते हैं, वैसे (त्वाम्) आपकी हम लोग सेवा करें और (त्वा) आपका सत्कार करें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जन अग्नि से दूतकर्म अर्थात् नौकर के सदृश काम कराते हैं, वे सब स्थानों में प्रशंसित ऐश्वर्य्यवाले होते हैं ॥३॥
Subject
अब शिल्पविद्यावेत्ता विद्वान् के विषय को कहते हैं ॥