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Rigveda Mandal 5 / Sukta 21 / Mantra 2

87 Sukta
4 Mantra
5/21/2
Devata- अग्निः Rishi- सस आत्रेयः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वं हि मानु॑षे॒ जनेऽग्ने॒ सुप्री॑त इ॒ध्यसे॑। स्रुच॑स्त्वा यन्त्यानु॒षक्सुजा॑त॒ सर्पि॑रासुते ॥२॥

त्वम् । हि । मानु॑षे । जने॑ । अग्ने॑ । सुऽप्री॑तः । इ॒ध्यसे॑ । स्रुचः॑ । त्वा॒ । य॒न्ति॒ । आ॒नु॒षक् । सुऽजा॑त । सर्पिः॑ऽआसुते ॥

Mantra without Swara
त्वं हि मानुषे जनेऽग्ने सुप्रीत इध्यसे। स्रुचस्त्वा यन्त्यानुषक्सुजात सर्पिरासुते ॥

त्वम्। हि। मानुषे। जने। अग्ने। सुऽप्रीतः। इध्यसे। स्रुचः। त्वा। यन्ति। आनुषक्। सुऽजात। सर्पिःऽआसुते ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 13 Mantra » 2

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Meaning
हे (सुजात) उत्तम प्रकार उत्पन्न (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रताप से वर्त्तमान ! जैसे अग्नि (सर्पिरासुते) घृत से सब ओर से प्रकाशित हुए में प्रकाशित किया जाता है, वैसे (हि) ही (त्वम्) आप (मानुषे, जने) प्रसिद्ध मनुष्य में (सुप्रीतः) उत्तम प्रकार प्रसन्न हुए (इध्यसे) प्रकाशित होते हो और जैसे (त्वा) आपको (स्रुचः) यज्ञ के साधन पात्र (आनुषक्) अनुकूलता से (यन्ति) प्राप्त होते हैं, वैसे ही आप सबके प्रति अनुकूल हूजिये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! आप लोग जैसे अग्नि इन्धन और घृत आदिकों को प्राप्त होकर वृद्धि को प्राप्त होता है, वैसे ही विद्या और उत्तम गुणों को प्राप्त होकर निरन्तर वृद्धि को प्राप्त हूजिये ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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