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Rigveda Mandal 5 / Sukta 20 / Mantra 4

87 Sukta
4 Mantra
5/20/4
Devata- अग्निः Rishi- प्रयस्वन्तः आत्रेयः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ॒त्था यथा॑ त ऊ॒तये॒ सह॑सावन्दि॒वेदि॑वे। रा॒य ऋ॒ताय॑ सुक्रतो॒ गोभिः॑ ष्याम सध॒मादो॑ वी॒रैः स्या॑म सध॒मादः॑ ॥४॥

इ॒त्था । यथा॑ । ते॒ । ऊ॒तये॑ । सह॑साऽवन् । दि॒वेऽदि॑वे । रा॒ये । ऋ॒ताय॑ । सु॒क्र॒तो॒ इति॑ सुऽक्रतो । गोभिः॑ । स्या॒म॒ । स॒ध॒ऽमादः॑ । वी॒रैः । स्या॒म॒ । स॒ध॒ऽमादः॑ ॥

Mantra without Swara
इत्था यथा त ऊतये सहसावन्दिवेदिवे। राय ऋताय सुक्रतो गोभिः ष्याम सधमादो वीरैः स्याम सधमादः ॥

इत्था। यथा। ते। ऊतये। सहसाऽवन्। दिवेऽदिवे। राये। ऋताय। सुक्रतो इति सुऽक्रतो। गोभिः। स्यामः। सधऽमादः। वीरैः। स्याम। सधऽमादः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 12 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सहसावन्) बल से तुल्य (सुक्रतो) उत्तम बुद्धि से युक्त ! (यथा) जैसे (ते) आपके (ऊतये) रक्षण आदि के लिये (दिवेदिवे) प्रतिदिन (ऋताय) धर्मयुक्त व्यवहार से प्राप्त (राये) धन के लिये हम लोग (गोभिः) वाणियों से (सधमादः) साथ स्थानवाले (स्याम) होवें (वीरैः) शूरवीरों से (सधमादः) साथ स्थानवाले (स्याम) होवें (इत्था) इस कारण से आप हूजिये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो साहस से पुरुषार्थ करते हुए वीर जनों की सेना को ग्रहण करके ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करते हैं, वे ही सुखी होते हैं ॥४॥ इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह बीसवाँ सूक्त और बारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥