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Rigveda Mandal 5 / Sukta 2 / Mantra 3

87 Sukta
12 Mantra
5/2/3
Devata- अग्निः Rishi- कुमार आत्रेयो वृषो वा जार उभौ वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यदन्तं॒ शुचि॑वर्णमा॒रात्क्षेत्रा॑दपश्य॒मायु॑धा॒ मिमा॑नम्। द॒दा॒नो अ॑स्मा अ॒मृतं॑ वि॒पृक्व॒त्किं माम॑नि॒न्द्राः कृ॑णवन्ननु॒क्थाः ॥३॥

हिर॑ण्यऽदन्तम् । शुचि॑ऽवर्णम् । आ॒रात् । क्षेत्रा॑त् । अ॒प॒श्य॒म् । आयु॑धा । मिमा॑नम् । द॒दा॒नः । अ॒स्मै॒ । अ॒मृत॑म् । वि॒पृक्व॑त् । किम् । माम् । अ॒नि॒न्द्राः । कृ॒ण॒व॒न् । अ॒नु॒क्थाः ॥

Mantra without Swara
हिरण्यदन्तं शुचिवर्णमारात्क्षेत्रादपश्यमायुधा मिमानम्। ददानो अस्मा अमृतं विपृक्वत्किं मामनिन्द्राः कृणवन्ननुक्थाः ॥

हिरण्यऽदन्तम्। शुचिऽवर्णम्। आरात्। क्षेत्रात्। अपश्यम्। आयुधा। मिमानम्। ददानः। अस्मै। अमृतम्। विपृक्वत्। किम्। माम्। अनिन्द्राः। कृणवन्। अनुक्थाः ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 14 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो मैं, किया ब्रह्मचर्य्य जिन्होंने ऐसे स्त्री पुरुषों में से (क्षेत्रात्) संस्कार की हुई भार्या स्त्री से उत्पन्न हुए (हिरण्यदन्तम्) सुवर्ण वा तेज के तुल्य दाँतवाले (शुचिवर्णम्) पवित्र स्वरूपयुक्त अतिसुन्दर और (आयुधा) शस्त्र और अस्त्रों को (मिमानम्) धारण करनेवाले को (आरात्) समीप से (अपश्यम्) देखूँ और (अस्मै) इसके लिये (विपृक्वत्) विशेष करके सम्बद्ध (अमृतम्) मोक्षसुख को (ददानः) देता हुआ मैं हूँ उस (माम्) मुझ को (अनिन्द्राः) ऐश्वर्य्य से रहित (अनुक्थाः) अविद्वान् जन (किम्) क्या (कृणवन्) करें ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! पूर्ण शास्त्र नियत ब्रह्मचर्य्य, शिक्षा, विद्या, युवावस्था और परस्पर प्रीति के बिना सन्तानों का विवाह न करें । इस प्रकार करते हुए सब जन अति उत्तम सन्तानों को प्राप्त होकर अति ही आनन्द को प्राप्त होते हैं, जो इस प्रकार प्रसिद्ध होते हैं, उनके समीप दारिद्र्य मूर्खता वा दरिद्री और अविद्वान् जन कुछ भी विघ्न नहीं कर सकते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥