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Rigveda Mandal 5 / Sukta 2 / Mantra 12

87 Sukta
12 Mantra
5/2/12
Devata- अग्निः Rishi- कुमार आत्रेयो वृषो वा जार उभौ वा Chhanda- निचृदतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तु॒वि॒ग्रीवो॑ वृष॒भो वा॑वृधा॒नो॑ऽश॒त्र्व१॒॑र्यः सम॑जाति॒ वेदः॑। इती॒मम॒ग्निम॒मृता॑ अवोचन्ब॒र्हिष्म॑ते॒ मन॑वे॒ शर्म॑ यंसद्ध॒विष्म॑ते॒ मन॑वे॒ शर्म॑ यंसत् ॥१२॥

तु॒वि॒ऽग्रीवः॑ । वृ॒ष॒भः । व॒वृ॒धा॒नः । अ॒श॒त्रु । अ॒र्यः । सम् । अ॒जा॒ति॒ । वेदः॑ । इति॑ । इ॒मम् । अ॒ग्निम् । अ॒मृताः॑ । अ॒वो॒च॒न् । ब॒र्हिष्म॑ते । मन॑वे । शर्म॑ । यं॒स॒त् । ह॒विष्म॑ते । मन॑वे । शर्म॑ । यं॒स॒त् ॥

Mantra without Swara
तुविग्रीवो वृषभो वावृधानोऽशत्र्व१र्यः समजाति वेदः। इतीममग्निममृता अवोचन्बर्हिष्मते मनवे शर्म यंसद्धविष्मते मनवे शर्म यंसत् ॥

तुविऽग्रीवः। वृषभः। वावृधानः। अशत्रु। अर्यः। सम्। अजाति। वेदः। इति। इमम्। अग्निम्। अमृताः। अवोचन्। बर्हिष्मते। मनवे। शर्म। यंसत्। हविष्मते। मनवे। शर्म। यंसत् ॥१२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 15 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! जैसे (तुविग्रीवः) बहुत बल वा सुन्दरी ग्रीवायुक्त (वावृधानः) अत्यन्त बढ़ता हुआ (वृषभः) अतीव बलवान् (अर्य्यः) स्वामी (अशत्रु) शत्रुओं से रहित (वेदः) धन को (सम्, अजाति) अच्छे प्रकार प्राप्त होवे और (बर्हिष्मते) ज्ञान की वृद्धि से युक्त (मनवे) मनुष्य के लिये (शर्म) सुख वा गृह को (यंसत्) देवे और (हविष्मते) बहुत उत्तम पदार्थों से युक्त (मनवे) विचारशील पुरुष के लिये (शर्म) सुख को (यंसत्) देवे (इति) इस प्रकार से (इमम्) इस (अग्निम्) बिजुली को (अमृताः) आत्मज्ञान जिनकी प्राप्त वे (अवोचन्) कहें ॥१२॥
Essence
सब विद्वान् जन ही सब विद्यार्थियों के लिये उत्तम शिक्षा देकर शत्रुता को छुड़ा के सब प्रकार के सुख को प्राप्त होवें ॥१२॥ इस सूक्त में युवावस्था में विवाह और विद्वान् के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह द्वितीय सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर विद्वानों के गुणों को कहते हैं ॥