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Rigveda Mandal 5 / Sukta 2 / Mantra 1

87 Sukta
12 Mantra
5/2/1
Devata- अग्निः Rishi- कुमार आत्रेयो वृषो वा जार उभौ वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कु॒मा॒रं मा॒ता यु॑व॒तिः समु॑ब्धं॒ गुहा॑ बिभर्ति॒ न द॑दाति पि॒त्रे। अनी॑कमस्य॒ न मि॒नज्जना॑सः पु॒रः प॑श्यन्ति॒ निहि॑तमर॒तौ ॥१॥

कु॒मा॒रम् । मा॒ता । यु॒व॒तिः । सम्ऽउ॑ब्धम् । गुहा॑ । बि॒भ॒र्ति॒ । न । द॒दा॒ति॒ । पि॒त्रे । अनी॑कम् । अ॒स्य॒ । न । मि॒नत् । जना॑सः । पु॒रः । प॒श्य॒न्ति॒ । निऽहि॑तम् । अ॒र॒तौ ॥

Mantra without Swara
कुमारं माता युवतिः समुब्धं गुहा बिभर्ति न ददाति पित्रे। अनीकमस्य न मिनज्जनासः पुरः पश्यन्ति निहितमरतौ ॥

कुमारम्। माता। युवतिः। सम्ऽउब्धम्। गुहा। बिभर्ति। न। ददाति। पित्रे। अनीकम्। अस्य। न। मिनत्। जनासः। पुरः। पश्यन्ति। निऽहितम्। अरतौ ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 14 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (युवतिः) पूर्ण अवस्था अर्थात् विवाह करने योग्य अवस्थावाली होकर जिस स्त्री ने विवाह किया ऐसी (माता) माता (समुब्धम्) तुल्यता से ढपे हुए (कुमारम्) कुमार को (गुहा) गर्भाशय में (बिभर्ति) धारण करती और (पित्रे) उस पुत्र के पिता के लिये (न) नहीं (ददाति) देती है (अस्य) इस पिता के (अनीकम्) समुदायबल को अर्थात् (न) जो नहीं (मिनत्) नाश करनेवाला होता हुआ (अरतौ) रमणसमय से अन्यसमय में (निहितम्) स्थित उसको (जनासः) विद्वान् जन (पुरः) पहिले (पश्यन्ति) देखते हैं, वैसा ही आप लोग आचरण करो ॥१॥
Essence
जो कुमार और कुमारी ब्रह्मचर्य्य से विद्या पढ़के और सन्तान के उत्पन्न करने की रीति को जान के पूर्ण अवस्था अर्थात् विवाह करने के योग्य अवस्था होने पर स्वयंवर नामक विवाह को करके सन्तान की उत्पत्ति करते हैं तो वे सदा आनन्दित होते हैं ॥१॥
Subject
अब बारह ऋचावाले द्वितीय सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में युवावस्था में विवाह करने के विषय को कहते हैं ॥

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