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Rigveda Mandal 5 / Sukta 19 / Mantra 4

87 Sukta
5 Mantra
5/19/4
Devata- अग्निः Rishi- वव्रिरात्रेयः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प्रि॒यं दु॒ग्धं न काम्य॒मजा॑मि जा॒म्योः सचा॑। घ॒र्मो न वाज॑जठ॒रोऽद॑ब्धः॒ शश्व॑तो॒ दभः॑ ॥४॥

प्रि॒यम् । दु॒ग्धम् । न । काम्य॑म् । अजा॑मि । जा॒म्योः । सचा॑ । घ॒र्मः । न । वाज॑ऽजठरः । अद॑ब्धः । शश्व॑तः । दभः॑ ॥

Mantra without Swara
प्रियं दुग्धं न काम्यमजामि जाम्योः सचा। घर्मो न वाजजठरोऽदब्धः शश्वतो दभः ॥

प्रियम्। दुग्धम्। न। काम्यम्। अजामि। जाम्योः। सचा। घर्मः। न। वाजऽजठरः। अदब्धः। शश्वतः। दभः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 11 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(वाजजठरः) क्षुधा का वेग उदर में जिससे हो (अदब्धः) जो नहीं हिंसा करने योग्य (शश्वतः) निरन्तर व्याप्त (दभः) और जिससे नाश करता है उस (घर्मः) प्रताप के (न) सदृश वा (प्रियम्) प्रिय (दुग्धम्) दुग्ध के (न) सदृश (सचा) सम्बन्ध से (जाम्योः) खाने योग्य अन्न को देनेवाले प्रकाश और पृथिवी के (काम्यम्) कामना करने योग्य पदार्थ को (अजामि) प्राप्त होता हूँ, इससे मेरे साथ आप लोग भी इसको करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो सूर्य्य के प्रकाश के सदृश विद्या से व्याप्त, दुग्ध के सदृश प्रिय वचनवाले और धर्म्म की कामना करते हुए जन हैं, वे पृथ्वी के सदृश सब के रक्षक होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥