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Rigveda Mandal 5 / Sukta 19 / Mantra 3

87 Sukta
5 Mantra
5/19/3
Devata- अग्निः Rishi- वव्रिरात्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ श्वै॑त्रे॒यस्य॑ ज॒न्तवो॑ द्यु॒मद्व॑र्धन्त कृ॒ष्टयः॑। नि॒ष्कग्री॑वो बृ॒हदु॑क्थ ए॒ना मध्वा॒ न वा॑ज॒युः ॥३॥

आ । श्वै॒त्रे॒यस्य॑ । ज॒न्तवः॑ । द्यु॒ऽमत् । व॒र्ध॒न्त॒ । कृ॒ष्टयः॑ । नि॒ष्कऽग्री॑वः । बृ॒हत्ऽउ॑क्थः । ए॒ना । मध्वा॑ । न । वा॒ज॒ऽयुः ॥

Mantra without Swara
आ श्वैत्रेयस्य जन्तवो द्युमद्वर्धन्त कृष्टयः। निष्कग्रीवो बृहदुक्थ एना मध्वा न वाजयुः ॥

आ। श्वैत्रैयस्य। जन्तवः। द्युऽमत्। वर्धन्त। कृष्टयः। निष्कऽग्रीवः। बृहत्ऽउक्थः। एना। मध्वा। न। वाजऽयुः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 11 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वानो ! जिस (श्वैत्रेयस्य) अन्तरिक्ष में स्थित दिशाओं में उत्पन्न जल के मध्य में (जन्तवः) जीव और (कृष्टयः) मनुष्य (वर्धन्त) वृद्धि को प्राप्त होते हैं (एना) इस (मध्वा) मधुर जल से (वाजयुः) अन्न की कामना करते हुए के (न) सदृश (बृहदुक्थः) अत्यन्त प्रशंसित (निष्कग्रीवः) एक निष्क का जिसमें चार सुवर्ण प्रमाण से युक्त आभूषण जिसकी ग्रीवा में ऐसा पुरुष (द्युमत्) प्रकाश से युक्त सुख को (आ) प्राप्त होता है ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! इस संसार में जितने पदार्थ हैं, वे सब जल ही से होते हैं अर्थात् सब का बीज जल ही है, ऐसा जान कर सब सुखों को प्राप्त होओ ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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