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Rigveda Mandal 5 / Sukta 18 / Mantra 4

87 Sukta
5 Mantra
5/18/4
Devata- अग्निः Rishi- दितो मृतवाहा आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
चि॒त्रा वा॒ येषु॒ दीधि॑तिरा॒सन्नु॒क्था पान्ति॒ ये। स्ती॒र्णं ब॒र्हिः स्व॑र्णरे॒ श्रवां॑सि दधिरे॒ परि॑ ॥४॥

चि॒त्रा । वा॒ । येषु॑ । दीधि॑तिः । आ॒सन् । उ॒क्था । पान्ति॑ । ये । स्ती॒र्णम् । ब॒र्हिः । स्वः॑ऽनरे । श्रवां॑सि । द॒धि॒रे॒ । परि॑ ॥

Mantra without Swara
चित्रा वा येषु दीधितिरासन्नुक्था पान्ति ये। स्तीर्णं बर्हिः स्वर्णरे श्रवांसि दधिरे परि ॥

चित्रा। वा। येषु। दीधितिः। आसन्। उक्था। पान्ति। ये। स्तीर्णम्। बर्हिः। स्वःऽनरे। श्रवांसि। दधिरे। परि ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 10 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (येषु) जिन अतिथियों में (चित्रा) विचित्र (दीधितिः) प्रकाशमान विद्या है और (आसन्) आसन वा मुख में (उक्था) प्रशंसा करने योग्य कर्म हैं और (ये, वा) अथवा जो (स्तीर्णम्) आच्छादित अर्थात् अन्तःकरण में व्याप्त (बर्हिः) अन्तरिक्ष के सदृश विज्ञान की (स्वर्णरे) सुख से युक्त मनुष्य में (पान्ति) रक्षा करते हैं और (श्रवांसि) अन्नादिकों को (परि) सब ओर से (दधिरे) धारण करें, वे ही श्रेष्ठ अतिथि होते हैं ॥४॥
Essence
जो विद्या के उत्तम गुणों से पूर्ण, सब के हित चाहनेवाले, पुरुषार्थी अर्थात् उत्साही और पक्षपात से रहित अतिथिजन उपदेश से सब की रक्षा करते हैं, वे संसार के कल्याण करनेवाले होते हैं ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥