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Rigveda Mandal 5 / Sukta 18 / Mantra 2

87 Sukta
5 Mantra
5/18/2
Devata- अग्निः Rishi- दितो मृतवाहा आत्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
द्वि॒ताय॑ मृ॒क्तवा॑हसे॒ स्वस्य॒ दक्ष॑स्य मं॒हना॑। इन्दुं॒ स ध॑त्त आनु॒षक्स्तो॒ता चि॑त्ते अमर्त्य ॥२॥

द्वि॒ताय॑ । मृ॒क्तऽवा॑हसे । स्वस्य॑ । दक्ष॑स्य । मं॒हना॑ । इन्दु॒म् । सः । ध॒त्ते॒ । आ॒नु॒षक् । स्तो॒ता । चि॒त् ते॒ । अ॒म॒र्त्य॒ ॥

Mantra without Swara
द्विताय मृक्तवाहसे स्वस्य दक्षस्य मंहना। इन्दुं स धत्त आनुषक्स्तोता चित्ते अमर्त्य ॥

द्विताय। मृक्तऽवाहसे। स्वस्य। दक्षस्य। मंहना। इन्दुम्। सः। धत्ते। आनुषक्। स्तोता। चित्। ते। अमर्त्य ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 10 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अमर्त्य) अपने स्वरूप से नित्य ! जो (स्तोता) सत्य विद्या की प्रशंसा करनेवाला (आनुषक्) अनुकूलता से (इन्दुम्) ऐश्वर्य्य को (चित्) ही (ते) तेरे लिये (धत्ते) धारण करता है (सः) वह (द्विताय) दो जन्मों से विद्या को प्राप्त (मृक्तवाहसे) शुद्ध विज्ञान को प्राप्त करानेवाले (स्वस्य) और अपने (दक्षस्य) बल के (मंहना) बड़प्पन के साथ वर्त्तमान अतिथि के लिये सुख देवे ॥२॥
Essence
जो मनुष्य यथार्थवक्ता अतिथियों का सत्कार करते हैं, वे सत्य विज्ञान को प्राप्त हो कर सर्वदा आनन्दित होते हैं ॥२॥
Subject
फिर अतिथिविषय को कहते हैं ॥