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Rigveda Mandal 5 / Sukta 18 / Mantra 1

87 Sukta
5 Mantra
5/18/1
Devata- अग्निः Rishi- दितो मृतवाहा आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्रा॒तर॒ग्निः पु॑रुप्रि॒यो वि॒शः स्त॑वे॒ताति॑थिः। विश्वा॑नि॒ यो अम॑र्त्यो ह॒व्या मर्ते॑षु॒ रण्य॑ति ॥१॥

प्रा॒तः । अ॒ग्निः । पु॒रु॒ऽप्रि॒यः । वि॒शः । स्त॒वे॒त॒ । अति॑थिः । विश्वा॑नि । यः । अम॑र्त्यः । ह॒व्या । मर्ते॑षु । रण्य॑ति ॥

Mantra without Swara
प्रातरग्निः पुरुप्रियो विशः स्तवेतातिथिः। विश्वानि यो अमर्त्यो हव्या मर्तेषु रण्यति ॥

प्रातः। अग्निः। पुरुऽप्रियः। विशः। स्तवेत। अतिथिः। विश्वानि। यः। अमर्त्यः। हव्या। मर्तेषु। रण्यति ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 10 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (अग्निः) अग्नि के सदृश पवित्र (पुरुप्रियः) बहुतों से कामना किया वा सेवन किया गया (मर्त्तेषु) नाश होनेवाले कार्य्यों में (अमर्त्यः) स्वभाव से मरणधर्म्मरहित (रण्यति) रमता है (विश्वानि) सम्पूर्ण (हव्या) देने योग्यों की (स्तवेत) प्रशंसा करे और जो (प्रातः) प्रातःकाल के आरम्भ से (विशः) प्रजाओं को उपदेश देवे वह (अतिथिः) आदर करने योग्य यथार्थवक्ता विद्वान् सत्कार करने योग्य होता है ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो अतिथि आत्मा का जाननेवाला, सत्य का उपदेशक, विद्वान्, विद्वानों का प्रिय, परमात्मा के सदृश सब के हित को चाहनेवाला नित्य क्रीड़ा करता है, वह ही सत्कार करने योग्य है ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले अठारहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के सदृश अतिथि के विषय को कहते हैं ॥

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