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Rigveda Mandal 5 / Sukta 17 / Mantra 3

87 Sukta
5 Mantra
5/17/3
Devata- अग्निः Rishi- पुरुरात्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒स्य वासा उ॑ अ॒र्चिषा॒ य आयु॑क्त तु॒जा गि॒रा। दि॒वो न यस्य॒ रेत॑सा बृ॒हच्छोच॑न्त्य॒र्चयः॑ ॥३॥

अ॒स्य । वै । अ॒सौ । ऊँ॒ इति॑ । अ॒र्चिषा॑ । यः । अयु॑क्त । तु॒जा । गि॒रा । दि॒वः । न । यस्य॑ । रेत॑सा । बृ॒हत् । शोच॑न्ति । अ॒र्चयः॑ ॥

Mantra without Swara
अस्य वासा उ अर्चिषा य आयुक्त तुजा गिरा। दिवो न यस्य रेतसा बृहच्छोचन्त्यर्चयः ॥

अस्य। वै। असौ। ऊँ इति। अर्चिषा। यः। अयुक्त। तुजा। गिरा। दिवः। न। यस्य। रेतसा। बृहत्। शोचन्ति। अर्चयः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 9 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (यः) जो (असौ) यह (अस्य) इसकी (वै) निश्चय से (अर्चिषा) विद्या की दीप्ति और (गिरा) वाणी से (आयुक्त) युक्त होता (उ) और (यस्य) जिसके (रेतसा) पराक्रम से (दिवः) जैसे मनोहर प्रयोजन के (न) वैसे (अर्चयः) उत्तम सत्कार (बृहत्) बड़े (शोचन्ति) शोभित होते हैं, वह आप दुःखों की (तुजा) हिंसा करो ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जिन विद्वानों के सूर्य्य के प्रकाश के सदृश विद्या यशः और कीर्ति विलास को प्राप्त होते हैं, वे ही बड़े विज्ञान को उत्पन्न करते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥