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Rigveda Mandal 5 / Sukta 16 / Mantra 2

87 Sukta
5 Mantra
5/16/2
Devata- अग्निः Rishi- पुरुरात्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स हि द्युभि॒र्जना॑नां॒ होता॒ दक्ष॑स्य बा॒ह्वोः। वि ह॒व्यम॒ग्निरा॑नु॒षग्भगो॒ न वार॑मृण्वति ॥२॥

सः । हि । द्युऽभिः॑ । जना॑नाम् । होता॑ । दक्ष॑स्य । बा॒ह्वोः । वि । ह॒व्यम् । अ॒ग्निः । आ॒नु॒षक् । भगः॑ । न । वार॑म् । ऋ॒ण्व॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
स हि द्युभिर्जनानां होता दक्षस्य बाह्वोः। वि हव्यमग्निरानुषग्भगो न वारमृण्वति ॥

सः। हि। द्युऽभिः। जनानाम्। होता। दक्षस्य। बाह्वोः। वि। हव्यम्। अग्निः। आनुषक्। भगः। न। वारम्। ऋण्वति ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 2

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Meaning
जो (जनानाम्) मनुष्यों की (बाह्वोः) भुजाओं के (दक्षस्य) बल का (होता) देनेवाला (अग्निः) अग्नि (भगः) सूर्य्य के (न) सदृश (आनुषक्) अनुकूलता से (वारम्) स्वीकार करने और (हव्यम्) देने योग्य पदार्थ को (वि, ऋण्वति) विशेष सिद्ध करता है (सः, हि) वही (द्युभिः) धर्मयुक्त कामों से बलवान् होता है ॥२॥
Essence
जो विद्वान् जन अपने आत्मा के सदृश सब मनुष्यों को जान और विद्या को प्राप्त करा के उन्नति करने की इच्छा करते हैं, वे ही भाग्यशाली वर्तमान हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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