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Rigveda Mandal 5 / Sukta 16 / Mantra 1

87 Sukta
5 Mantra
5/16/1
Devata- अग्निः Rishi- पुरुरात्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
बृ॒हद्वयो॒ हि भा॒नवेऽर्चा॑ दे॒वाया॒ग्नये॑। यं मि॒त्रं न प्रश॑स्तिभि॒र्मर्ता॑सो दधि॒रे पु॒रः ॥१॥

बृ॒हत् । वयः॑ । हि । भा॒नवे॑ । अर्च॑ । दे॒वाय॑ । अ॒ग्नये॑ । यम् । मि॒त्रम् । न । प्रश॑स्तिऽभिः । मर्ता॑सः । द॒धि॒रे । पु॒रः ॥

Mantra without Swara
बृहद्वयो हि भानवेऽर्चा देवायाग्नये। यं मित्रं न प्रशस्तिभिर्मर्तासो दधिरे पुरः ॥

बृहत्। वयः। हि। भानवे। अर्च। देवाय। अग्नये। यम्। मित्रम्। न। प्रशस्तिऽभिः। मर्तासः। दधिरे। पुरः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे विद्वन् ! (मर्त्तासः) मनुष्य (प्रशस्तिभिः) प्रशंसाओं से (यम्) जिसको (मित्रम्) मित्र के (न) समान (पुरः) प्रथम से (दधिरे) धारण करते हैं, उसको (भानवे) प्रकाश के लिये और (देवाय) श्रेष्ठ गुणवाले (अग्नये) बिजुली आदि के लिये (बृहत्) बड़ा (वयः) प्रदीप्त करनेवाला तेज जैसे हो, वैसे (हि) ही (अर्चा) पूजिये, आदर करिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे मित्र, मित्र को धारण करके सुख की वृद्धि को प्राप्त होता है, वैसे ही अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को प्राप्त होकर विद्वान् जन आनन्द से वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले सोलहवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में बिजुली के विषय को कहते हैं ॥

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