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Rigveda Mandal 5 / Sukta 15 / Mantra 4

87 Sukta
5 Mantra
5/15/4
Devata- अग्निः Rishi- धरुण आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा॒तेव॒ यद्भर॑से पप्रथा॒नो जनं॑जनं॒ धाय॑से॒ चक्ष॑से च। वयो॑वयो जरसे॒ यद्दधा॑नः॒ परि॒ त्मना॒ विषु॑रूपो जिगासि ॥४॥

मा॒ताऽइ॑व । यत् । भर॑से । प॒प्र॒था॒नः । जन॑म्ऽजनम् । धाय॑से । चक्ष॑से । च॒ । वयः॑ऽवयः । ज॒र॒से॒ । यत् । दधा॑नः । परि॑ । त्मना॑ । विषु॑ऽरूपः । जि॒गा॒सि॒ ॥

Mantra without Swara
मातेव यद्भरसे पप्रथानो जनंजनं धायसे चक्षसे च। वयोवयो जरसे यद्दधानः परि त्मना विषुरूपो जिगासि ॥

माताऽइव। यत्। भरसे। पप्रथानः। जनम्ऽजनम्। धायसे। चक्षसे। च। वयःऽवयः। जरसे। यत्। दधानः। परि। त्मना। विषुऽरूपः। जिगासि ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 7 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (यत्) जिस कारण (पप्रथानः) प्रसिद्ध विद्यायुक्त आप (मातेव) माता के सदृश (धायसे) धारण करने और (चक्षसे) कहाने को (च) भी (जनञ्जनम्) मनुष्य-मनुष्य का (भरसे) पोषण करते हो और (त्मना) आत्मा से (यत्) जिस कारण (दधानः) धारण करते हुए (वयोवयः) सुन्दर जीवन की (जरसे) स्तुति करते हो और (विषुरूपः) विद्या जिनको प्राप्त ऐसे हुए सम्पूर्ण पदार्थों की (परि) सब प्रकार से (जिगासि) प्रशंसा करते हो, इससे विद्वान् होते हो ॥४॥
Essence
जो विद्वान् जन माता के सदृश विद्यार्थियों की रक्षा करते, सब की उन्नति करने की इच्छा करते और ब्रह्मचर्य तथा अवस्था के बढ़ने में कारणरूप कार्य्यों का उपदेश करते हैं, वे संसार के आदर करने योग्य होते हैं ॥४॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥