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Rigveda Mandal 5 / Sukta 15 / Mantra 3

87 Sukta
5 Mantra
5/15/3
Devata- अग्निः Rishi- धरुण आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अं॒हो॒युव॑स्त॒न्व॑स्तन्वते॒ वि वयो॑ म॒हद्दु॒ष्टरं॑ पू॒र्व्याय॑। स सं॒वतो॒ नव॑जातस्तुतुर्यात्सिं॒हं न क्रु॒द्धम॒भितः॒ परि॑ ष्ठुः ॥३॥

अं॒हः॒ऽयुवः॑ । त॒न्वः॑ । त॒न्व॒ते॒ । वि । वयः॑ । म॒हत् । दु॒स्तर॑म् । पू॒र्व्याय॑ । सः । स॒म्ऽवतः॑ । नव॑ऽजातः । तु॒तु॒र्या॒त् । सिं॒हम् । न । क्रु॒द्धम् । अ॒भितः॑ । परि॑ । स्थुः ॥

Mantra without Swara
अंहोयुवस्तन्वस्तन्वते वि वयो महद्दुष्टरं पूर्व्याय। स संवतो नवजातस्तुतुर्यात्सिंहं न क्रुद्धमभितः परि ष्ठुः ॥

अंहःऽयुवः। तन्वः। तन्वते। वि। वयः। महत्। दुस्तरम्। पूर्व्याय। सः। सम्ऽवतः। नवऽजातः। तुतुर्यात्। सिंहम्। न। क्रुद्धम्। अभितः। परि। स्थुः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 7 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जिसके सम्बन्ध में (अंहोयुवः) जो अपराध को दूर करते वे (तन्वः) शरीर के मध्य में (तन्वते) विस्तार को प्राप्त होते और (महत्) बड़े (दुष्टरम्) दुःख से पार होने योग्य (वयः) जीवन को (वि) विशेष करके विस्तृत करते और सुख के (परि) सब ओर (स्थुः) स्थित होते हैं (सः) वह उनका सङ्गी (संवतः) उत्तम प्रकार सेवन किया गया (नवजातः) नवीन अभ्यास से उत्पन्न हुई विद्या जिसकी ऐसा पुरुष (पूर्व्याय) पूर्वज के लिये (क्रुद्धम्) क्रोधयुक्त (सिंहम्) सिंह के (न) सदृश अन्य को (अभितः) सब प्रकार से (तुतुर्यात्) नाश करे ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य पाप को दूर करके धर्म का आचरण करते हैं, वे शरीर और आत्मा के सुख और जीवन की वृद्धि कराते हैं। और जैसे क्रुद्ध सिंह प्राप्त हुए प्राणियों का नाश करता है, वैसे प्राप्त हुए दुर्गुणों का सब जन नाश करें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥