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Rigveda Mandal 5 / Sukta 14 / Mantra 6

87 Sukta
6 Mantra
5/14/6
Devata- अग्निः Rishi- सुतम्भर आत्रेयः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निं घृ॒तेन॑ वावृधुः॒ स्तोमे॑भिर्वि॒श्वच॑र्षणिम्। स्वा॒धीभि॑र्वच॒स्युभिः॑ ॥६॥

अ॒ग्निम् । घृ॒तेन॑ । व॒वृ॒धुः॒ । स्तोमे॑भिः । वि॒श्वऽच॑र्षणिम् । सु॒ऽआ॒धीभिः॑ । व॒च॒स्युऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
अग्निं घृतेन वावृधुः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणिम्। स्वाधीभिर्वचस्युभिः ॥

अग्निम्। घृतेन। ववृधुः। स्तोमेभिः। विश्वऽचर्षणिम्। सुऽआधीभिः। वचस्युऽभिः ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 6 Mantra » 6

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Meaning
जो (स्तोमेभिः) प्रशंसित कर्मों और (घृतेन) घृत से (विश्वचर्षणिम्) संसार के प्रकाश करनेवाले (अग्निम्) अग्नि की (वावृधुः) वृद्धि करावें उन (वचस्युभिः) अपने वचन की इच्छा करनेवाले (स्वाधीभिः) उत्तम प्रकार ध्यान से युक्त जनों के साथ सब मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को ग्रहण करें ॥६॥
Essence
जैसे ईंधन आदि से अग्नि बढ़ता है, वैसे ही सत्सङ्ग से विज्ञान बढ़ता है ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह चतुर्दश सूक्त और पञ्चम मण्डल में प्रथम अनुवाक और छठा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर अग्निविषय को कहते हैं ॥

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