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Rigveda Mandal 5 / Sukta 14 / Mantra 2

87 Sukta
6 Mantra
5/14/2
Devata- अग्निः Rishi- सुतम्भर आत्रेयः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तम॑ध्व॒रेष्वी॑ळते दे॒वं मर्ता॒ अम॑र्त्यम्। यजि॑ष्ठं॒ मानु॑षे॒ जने॑ ॥२॥

तम् । अ॒ध्व॒रेषु॑ । ई॒ळ॒ते॒ । दे॒वम् । मर्ताः॑ । अम॑र्त्यम् । यजि॑ष्ठम् । मानु॑षे । जने॑ ॥

Mantra without Swara
तमध्वरेष्वीळते देवं मर्ता अमर्त्यम्। यजिष्ठं मानुषे जने ॥

तम्। अध्वरेषु। ईळते। देवम्। मर्ताः। अमर्त्यम्। यजिष्ठम्। मानुषे। जने ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 6 Mantra » 2

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Meaning
जो (मर्ताः) मनुष्य (अध्वरेषु) नहीं नाश करने योग्य धर्मयुक्त व्यवहारों में (मानुषे) विचारशील (जने) जन में (तम्) उस (अमर्त्यम्) स्वरूप से नित्य (यजिष्ठम्) अतिशय मेल करनेवाले (देवम्) श्रेष्ठ गुणवाले अग्नि के सदृश स्वयं प्रकाशित परमात्मा की (ईळते) स्तुति करते हैं, वे ही बहुत सुख का भोग करते हैं ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थ के सदृश पदार्थविद्या को ग्रहण करते हैं, वे सब प्रकार सुखी होते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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