Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 5 / Sukta 13 / Mantra 6

87 Sukta
6 Mantra
5/13/6
Devata- अग्निः Rishi- सुतम्भर आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्ने॑ ने॒मिर॒राँ इ॑व दे॒वाँस्त्वं प॑रि॒भूर॑सि। आ राध॑श्चि॒त्रमृ॑ञ्जसे ॥६॥

अग्ने॑ । ने॒मिः । अ॒रान्ऽइ॑व । दे॒वान् । त्वम् । प॒रि॒ऽभूः । अ॒सि॒ । आ । राधः॑ । चि॒त्रम् । ऋ॒ञ्ज॒से॒ ॥

Mantra without Swara
अग्ने नेमिरराँ इव देवाँस्त्वं परिभूरसि। आ राधश्चित्रमृञ्जसे ॥

अग्ने। नेमिः। अरान्ऽइव। देवान्। त्वम्। परिऽभूः। असि। आ। राधः। चित्रम्। ऋञ्जसे ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 5 Mantra » 6

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (त्वम्) आप जैसे (नेमिः) रथाङ्ग (अरानिव) चक्रों के अङ्गों को वैसे (देवान्) श्रेष्ठ गुणों वा विद्वानों को (परिभूः) सब प्रकार से हुवानेवाले (असि) हो और (चित्रम्) विचित्र (राधः) धन को (आ, ऋञ्जसे) सिद्ध करते हो, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अरादिकों से चक्र उत्तम प्रकार शोभित होता है, वैसे ही विद्वानों और उत्तम गुणों से मनुष्य शोभित होते हैं ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तेरहवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥