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Rigveda Mandal 5 / Sukta 11 / Mantra 4

87 Sukta
6 Mantra
5/11/4
Devata- अग्निः Rishi- सुतम्भर आत्रेयः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्नो॑ य॒ज्ञमुप॑ वेतु साधु॒याग्निं नरो॒ वि भ॑रन्ते गृ॒हेगृ॑हे। अ॒ग्निर्दू॒तो अ॑भवद्धव्य॒वाह॑नो॒ऽग्निं वृ॑णा॒ना वृ॑णते क॒विक्र॑तुम् ॥४॥

अ॒ग्निः । नः॒ । य॒ज्ञम् । उप॑ । वे॒तु॒ । सा॒धु॒ऽया । अ॒ग्निम् । नरः॑ । वि । भ॒र॒न्ते॒ । गृ॒हेऽगृ॑हे । अ॒ग्निः । दू॒तः । अ॒भ॒व॒त् । ह॒व्य॒ऽवाह॑नः । अ॒ग्निम् । वृ॒णा॒नाः । वृ॒ण॒ते॒ । क॒विऽक्र॑तुम् ॥

Mantra without Swara
अग्निर्नो यज्ञमुप वेतु साधुयाग्निं नरो वि भरन्ते गृहेगृहे। अग्निर्दूतो अभवद्धव्यवाहनोऽग्निं वृणाना वृणते कविक्रतुम् ॥

अग्निः। नः। यज्ञम्। उप। वेतु। साधुऽया। अग्निम्। नरः। वि। भरन्ते। गृहेऽगृहे। अग्निः। दूतः। अभवत्। हव्यऽवाहनः। अग्निम्। वृणानाः। वृणते। कविऽक्रतुम् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 3 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (अग्निः) अग्नि (नः) हम लोगों के (यज्ञम्) मिलने योग्य व्यवहार को (उप, वेतु) व्याप्त हो और जैसे (साधुया) श्रेष्ठ (नरः) अग्रणी मनुष्य (गृहेगृहे) गृहगृह में (अग्निम्) अग्नि के सदृश (वि, भरन्ते) धारण करते हैं और जैसे (हव्यवाहनः) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को एक देश से दूसरे देशों में पहुँचानेवाला (अग्निः) अग्नि (दूतः) दूत के सदृश कार्य्यों का सिद्धकर्त्ता (अभवत्) होता है और जैसे (अग्निम्) अग्नि को (वृणानाः) स्वीकार करते हुए जन (कविक्रतुम्) बुद्धिमान् की बुद्धि का (वृणते) स्वीकार करते हैं, वैसे ही आप लोग आचरण करो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो अग्नि के सदृश तेजस्वी, सज्जनों के सदृश उपकार करने और प्रत्येक जन के लिये मङ्गल देनेवाले हैं, वे सर्वदा सत्कार करने योग्य हैं ॥४॥
Subject
फिर अग्न्यादिकों के गुणों को मन्त्र में कहते हैं ॥