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Rigveda Mandal 5 / Sukta 11 / Mantra 3

87 Sukta
6 Mantra
5/11/3
Devata- अग्निः Rishi- सुतम्भर आत्रेयः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
असं॑मृष्टो जायसे मा॒त्रोः शुचि॑र्म॒न्द्रः क॒विरुद॑तिष्ठो वि॒वस्व॑तः। घृ॒तेन॑ त्वावर्धयन्नग्न आहुत धू॒मस्ते॑ के॒तुर॑भवद्दि॒वि श्रि॒तः ॥३॥

अस॑म्ऽमृष्टः । जा॒य॒से॒ । मा॒त्रोः । शुचिः॑ । म॒न्द्रः । क॒विः । उत् । अ॒ति॒ष्ठः॒ । वि॒वस्व॑तः । घृ॒तेन॑ । त्वा॒ । अ॒व॒र्ध॒य॒न् । अ॒ग्ने॒ । आ॒ऽहु॒त॒ । धू॒मः । ते॒ । के॒तुः । अ॒भ॒व॒त् । दि॒वि । शृइ॒तः ॥

Mantra without Swara
असंमृष्टो जायसे मात्रोः शुचिर्मन्द्रः कविरुदतिष्ठो विवस्वतः। घृतेन त्वावर्धयन्नग्न आहुत धूमस्ते केतुरभवद्दिवि श्रितः ॥

असंऽमृष्टः। जायसे। मात्रोः। शुचिः। मन्द्रः। कविः। उत्। अतिष्ठः। विवस्वतः। घृतेन। त्वा। अवर्धयन्। अग्ने। आऽहुत। धूमः। ते। केतुः। अभवत्। दिवि। श्रितः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 3 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (आहुत) सत्कार से निमन्त्रित (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान विद्यार्थी ! जो विद्वान् जन (विवस्वतः) सूर्य्य से (घृतेन) विद्या के प्रकाश से (त्वा) आपकी (अवर्धयन्) वृद्धि करें और जिन (ते) आपकी अग्नि के (धूमः) धूम के सदृश (दिवि) प्रकाशमान मनोहर और सत्कार करने योग्य परमेश्वर में (केतुः) जनानेवाले के सदृश बुद्धि (श्रितः) सेवन किई =की गयी (अभवत्) होती है तथा (मात्रोः) माता के सदृश आदर करनेवाले विद्या और आचार्य्य की शिक्षा को प्राप्त होकर (असंमृष्टः) अच्छे प्रकार अशुद्ध आप (मन्द्रः) प्रशंसित और आनन्दित (शुचिः) पवित्र (जायसे) होते हो और (कविः) विद्वान् (उत्, अतिष्ठः) उठता है, उनका हम लोग सत्कार करें ॥३॥
Essence
जो बालक वा कन्या विद्वानों वा पढ़ी हुई स्त्रियों से ब्रह्मचर्य्यपूर्वक विद्या को प्राप्त होकर पवित्र होते, वे संसार को शोभित करनेवाले होते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥