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Rigveda Mandal 5 / Sukta 10 / Mantra 3

87 Sukta
7 Mantra
5/10/3
Devata- अग्निः Rishi- गय आत्रेयः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वं नो॑ अग्न एषां॒ गयं॑ पु॒ष्टिं च॑ वर्धय। ये स्तोमे॑भिः॒ प्र सू॒रयो॒ नरो॑ म॒घान्या॑न॒शुः ॥३॥

त्वम् । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । ए॒षा॒म् । गय॑म् । पु॒ष्टिम् । च॒ । व॒र्ध॒य॒ । ये । स्तोमे॑भिः । प्र । सू॒रयः॑ । नरः॑ । म॒घानि॑ । आ॒न॒शुः ॥

Mantra without Swara
त्वं नो अग्न एषां गयं पुष्टिं च वर्धय। ये स्तोमेभिः प्र सूरयो नरो मघान्यानशुः ॥

त्वम्। नः। अग्ने। एषाम्। गयम्। पुष्टिम्। च। वर्धय। ये। स्तोमेभिः। प्र। सूरयः। नरः। मघानि। आनशुः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 2 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! (ये) जो (नरः) नायक (सूरयः) विद्वान् जन (स्तोमेभिः) वेद में वर्त्तमान स्तुति के प्रकरणों से (मघानि) धनों को (प्र, आनशुः) प्राप्त होवें, उनके साथ (त्वम्) आप (नः) हम लोगों और (एषाम्) इनके (गयम्) सन्तान तथा गृह वा धन (च) और (पुष्टिम्) पुष्टि को (वर्धय) वृद्धि कीजिये ॥३॥
Essence
विद्वानों को चाहिये कि यथार्थवक्ताओं के सहित सब मनुष्यों के सुख और बल को बढ़ावें ॥३॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को मन्त्र में कहते हैं ॥

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