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Rigveda Mandal 5 / Sukta 1 / Mantra 8

87 Sukta
12 Mantra
5/1/8
Devata- अग्निः Rishi- बुद्धगविष्ठरावात्रेयी Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मा॒र्जा॒ल्यो॑ मृज्यते॒ स्वे दमू॑नाः कविप्रश॒स्तो अति॑थिः शि॒वो नः॑। स॒हस्र॑शृङ्गो वृष॒भस्तदो॑जा॒ विश्वाँ॑ अग्ने॒ सह॑सा॒ प्रास्य॒न्यान् ॥८॥

मा॒र्जा॒ल्यः॑ । मृ॒ज्य॒ते॒ । स्वे । दमू॑नाः । क॒वि॒ऽप्र॒श॒स्तः । अति॑थिः । शि॒वः । नः॒ । स॒हस्र॑ऽशृङ्गः । वृ॒ष॒भः । तत्ऽओ॑जा । विश्वा॑न् । अ॒ग्ने॒ । सह॑सा । प्र । अ॒सि॒ । अ॒न्यान् ॥

Mantra without Swara
मार्जाल्यो मृज्यते स्वे दमूनाः कविप्रशस्तो अतिथिः शिवो नः। सहस्रशृङ्गो वृषभस्तदोजा विश्वाँ अग्ने सहसा प्रास्यन्यान् ॥

मार्जाल्यः। मृज्यते। स्वे। दमूनाः। कविऽप्रशस्तः। अतिथिः। शिवः। नः। सहस्रऽशृङ्गः। वृषभः। तत्ऽओजाः। विश्वान्। अग्ने। सहसा। प्र। असि। अन्यान् ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 13 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान (दमूनाः) इन्द्रियों को वश में रखनेवाले (कविप्रशस्तः) विद्वानों से प्रशंसा करने योग्य अथवा विद्वानों में प्रशंसा को प्राप्त (शिवः) मङ्गलस्वरूप वा मङ्गल करनेवाले (अतिथिः) जिनकी आने की कोई तिथि नियत विद्यमान न हो (सहस्रशृङ्गः) जो हजारों शृङ्गों के तुल्य तेजों से युक्त (वृषभः) बलिष्ठ और वृष्टि करनेवाले (तदोजाः) जिनका वही पराक्रम (मार्जाल्यः) जो अत्यन्त शुद्ध करनेवाले अग्नि के सदृश आप (स्वे) अपने में (प्र, मृज्यते) शुद्ध किये जाते हैं, वह (सहसा) बल से (विश्वान्) सम्पूर्ण (नः) हम लोगों की तथा (अन्यान्) अन्यों की रक्षा करते हुए (असि) विद्यमान हो, उनकी हम लोग सेवा करें ॥८॥
Essence
वे ही अतिथि होवें जो इन्द्रियों के दमन करने और मङ्गलाचरण करनेवाले धर्म्मिष्ठ विद्वान् और सब के प्रिय साधन में प्रीति करनेवाले होवें और जैसे अग्नि सब का शुद्ध करनेवाला है, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् के पवित्र करनेवाले अतिथि जन हैं ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥