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Rigveda Mandal 5 / Sukta 1 / Mantra 7

87 Sukta
12 Mantra
5/1/7
Devata- अग्निः Rishi- बुद्धगविष्ठरावात्रेयी Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र णु त्यं विप्र॑मध्व॒रेषु॑ सा॒धुम॒ग्निं होता॑रमीळते॒ नमो॑भिः। आ यस्त॒तान॒ रोद॑सी ऋ॒तेन॒ नित्यं॑ मृजन्ति वा॒जिनं॑ घृ॒तेन॑ ॥७॥

प्र । नु । त्यम् । विप्र॑म् । अ॒ध्व॒रेषु॑ । सा॒धुम् । अ॒ग्निम् । होता॑रम् । ई॒ळते॑ । नमः॑ऽभिः । आ । यः । त॒तान॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । ऋ॒तेन॑ । नित्य॑म् । मृ॒ज॒न्ति॒ । वा॒जिन॑म् । घृ॒तेन॑ ॥

Mantra without Swara
प्र णु त्यं विप्रमध्वरेषु साधुमग्निं होतारमीळते नमोभिः। आ यस्ततान रोदसी ऋतेन नित्यं मृजन्ति वाजिनं घृतेन ॥

प्र। नु। त्यम्। विप्रम्। अध्वरेषु। साधुम्। अग्निम्। होतारम्। ईळते। नमःऽभिः। आ। यः। ततान। रोदसी इति। ऋतेन। नित्यम्। मृजन्ति। वाजिनम्। घृतेन ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 13 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो! (यः) जो अग्नि (नमोभिः) अन्न आदिकों से (ऋतेन) सत्य से (घृतेन) और जल से (वाजिनम्) गतिवाले पदार्थ को (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (आ, ततान) विस्तृत करता अर्थात् अन्तरिक्ष और पृथिवी पर पहुँचाता है, उसकी विद्या से जो (नित्यम्) नित्य (मृजन्ति) शुद्ध करते और (त्यम्) उस (अग्निम्) अग्नि के सदृश (होतारम्) यज्ञ करनेवाले (साधुम्) श्रेष्ठ (विप्रम्) बुद्धिमान् की (अध्वरेषु) नहीं हिंसा करने योग्य व्यवहारों में (नु) शीघ्र (प्र, ईळते) अच्छे प्रकार स्तुति करते हैं, वे सुखी होते हैं ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्वान् जन अग्नि को कार्य्यों में संप्रयुक्त अर्थात् काम में लाकर धन और धान्य से युक्त होते हैं, वैसे ही इसकी विद्या को कार्यों में संयुक्त करके प्रत्यक्ष विद्यायुक्त होते हैं ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥