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Rigveda Mandal 5 / Sukta 1 / Mantra 6

87 Sukta
12 Mantra
5/1/6
Devata- अग्निः Rishi- बुद्धगविष्ठरावात्रेयी Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्होता॒ न्य॑सीद॒द्यजी॑यानु॒पस्थे॑ मा॒तुः सु॑र॒भा उ॑ लो॒के। युवा॑ क॒विः पु॑रुनिः॒ष्ठ ऋ॒तावा॑ ध॒र्ता कृ॑ष्टी॒नामु॒त मध्य॑ इ॒द्धः ॥६॥

अ॒ग्निः । होता॑ । नि । अ॒सी॒द॒त् । यजी॑यान् । उ॒पऽस्थे॑ । मा॒तुः । सु॒र॒भौ । ऊँ॒ इति॑ । लो॒के । युवा॑ । क॒विः । पु॒रु॒निः॒ऽष्ठः । ऋ॒तऽवा॑ । ध॒र्ता । कृ॒ष्टी॒नाम् । उ॒त । मध्ये॑ । इ॒द्धः ॥

Mantra without Swara
अग्निर्होता न्यसीदद्यजीयानुपस्थे मातुः सुरभा उ लोके। युवा कविः पुरुनिःष्ठ ऋतावा धर्ता कृष्टीनामुत मध्य इद्धः ॥

अग्निः। होता। नि। असीदत्। यजीयान्। उपऽस्थे। मातुः। सुरभौ। ऊँ इति। लोके। युवा। कविः। पुरुनिःऽस्थः। ऋतऽवा। धर्ता। कृष्टीनाम्। उत। मध्ये। इद्धः ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 12 Mantra » 6

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Meaning
हे मनुष्यो! जैसे (मध्ये) मध्य में (इद्धः) प्रदीप्त (अग्निः) बिजुली सदृश (यजीयान्) अत्यन्त यज्ञकर्त्ता (युवा) बलवान् (कविः) उत्तम बुद्धिवाला विद्वान् (पुरुनिःष्ठः) अनेक प्रकार की श्रद्धा व बहुत स्थानोंवाला (ऋतावा) सत्य का विभाग करनेवाला (धर्त्ता) और धारण करनेवाला (होता) यज्ञकर्त्ता (सुरभौ) सुगन्धित (मातुः) माता के (उपस्थे) समीप में (लोके) लोक में (नि, असीदत्) निरन्तर स्थित होवे (उ) वही (कृष्टीनाम्) मनुष्यों का (उत) और पशु आदिकों का रक्षक होवे ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि मातारूप वायु में विराजता हुआ बिजुलीरूप से सब को सुख देता है, वैसे ही धार्मिक विद्वान् सब को आनन्द दिलाने के योग्य है ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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