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Rigveda Mandal 5 / Sukta 1 / Mantra 12

87 Sukta
12 Mantra
5/1/12
Devata- अग्निः Rishi- बुद्धगविष्ठरावात्रेयी Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अवो॑चाम क॒वये॒ मेध्या॑य॒ वचो॑ व॒न्दारु॑ वृष॒भाय॒ वृष्णे॑। गवि॑ष्ठिरो॒ नम॑सा॒ स्तोम॑म॒ग्नौ दि॒वी॑व रु॒क्ममु॑रु॒व्यञ्च॑मश्रेत् ॥१२॥

अवो॑चाम । क॒वये॑ । मेध्या॑य । वचः॑ । व॒न्दारु॑ । वृ॒ष॒भाय॑ । वृष्णे॑ । गवि॑ष्ठिरः । नम॑सा । स्तोम॑म् । अ॒ग्नौ । दि॒विऽइ॑व । रु॒क्मम् । उ॒रु॒ऽव्यञ्च॑म् । अ॒श्रे॒त् ॥

Mantra without Swara
अवोचाम कवये मेध्याय वचो वन्दारु वृषभाय वृष्णे। गविष्ठिरो नमसा स्तोममग्नौ दिवीव रुक्ममुरुव्यञ्चमश्रेत् ॥

अवोचाम। कवये। मेध्याय। वचः। वन्दारु। वृषभाय। वृष्णे। गविष्ठिरः। नमसा। स्तोमम्। अग्नौ। दिविऽइव। रुक्मम्। उरुऽव्यञ्चम्। अश्रेत् ॥१२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 13 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजा आदि मनुष्यो अतिथि ! हम लोग जो (गविष्ठिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी में स्थित (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (दिवीव) जैसे सूर्य्य में वैसे (अग्नौ) अग्नि में (रुक्मम्) प्रीतिकारक और प्रकाशयुक्त (उरुव्यञ्चम्) बहुत व्यापक और (स्तोमम्) प्रशंसा करने योग्य का (अश्रेत्) आश्रय करें उस (वृष्णे) सत्य उपदेश की वृष्टि करनेवाले (वृषभाय) बलिष्ठ (मेध्याय) पवित्र (कवये) विद्वान् जन के लिये (वन्दारु) प्रशंसा करने योग्य और धर्म्मसम्बन्धी (वचः) वचन का (अवोचाम) उपदेश करें ॥१२॥
Essence
उन पुरुषों को ही विद्वान् अतिथि जन विशेष उपदेश देवें कि जो पवित्रात्मा विद्या में प्रीति करने और उत्तम क्रियाओं के जानने की इच्छा करनेवाले होवें और जो इन बातों से विपरीत अर्थात् रहित हों उनको अधिकार की योग्यता अर्थात् विशेष उपदेश के समझने का सामर्थ्य साधारण उपदेश के द्वारा प्राप्त करा के अधिकारी करें ॥१२॥ इस सूक्त में उपदेश सुनने और उपदेश के सुनानेवाले का गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह प्रथम सूक्त और तेरहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥