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Rigveda Mandal 5 / Sukta 1 / Mantra 11

87 Sukta
12 Mantra
5/1/11
Devata- अग्निः Rishi- बुद्धगविष्ठरावात्रेयी Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आद्य रथं॑ भानुमो भानु॒मन्त॒मग्ने॒ तिष्ठ॑ यज॒तेभिः॒ सम॑न्तम्। वि॒द्वान्प॑थी॒नामु॒र्व१॒॑न्तरि॑क्ष॒मेह दे॒वान्ह॑वि॒रद्या॑य वक्षि ॥११॥

आ । अ॒द्य । रथ॑म् । भा॒नु॒ऽमः॒ । भा॒नु॒ऽमन्त॑म् । अग्ने॑ । तिष्ठ॑ । य॒ज॒तेभिः॑ । सम्ऽअ॑न्तम् । वि॒द्वान् । प॒थी॒नाम् । उ॒रु । अ॒न्तरि॑क्षम् । आ । इ॒ह । दे॒वान् । ह॒विः॒ऽअद्या॑य । व॒क्षि॒ ॥

Mantra without Swara
आद्य रथं भानुमो भानुमन्तमग्ने तिष्ठ यजतेभिः समन्तम्। विद्वान्पथीनामुर्व१न्तरिक्षमेह देवान्हविरद्याय वक्षि ॥

आ। अद्य। रथम्। भानुऽमः। भानुऽमन्तम्। अग्ने। तिष्ठ। यजतेभिः। सम्ऽअन्तम्। विद्वान्। पथीनाम्। उरु। अन्तरिक्षम्। आ। इह। देवान्। हविःऽअद्याय। वक्षि ॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 13 Mantra » 5

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Meaning
हे (भानुमः) कान्तिवाले (अग्ने) विद्वन् ! आप (इह) यहाँ (अद्य) इस समय (यजतेभिः) प्राप्त हुए घोड़े आदिकों से संयुक्त (समन्तम्) सब प्रकार दृढ़ अवयवोंवाले (भानुमन्तम्) कान्तियुक्त (रथम्) सुन्दर वाहन पर (आ) अच्छे प्रकार (तिष्ठ) विराजिये इससे (विद्वान्) विद्यायुक्त आप (पथीनाम्) मार्गों के (उरु) व्यापक (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को और (हविरद्याय) खाने योग्य अन्न आदि के लिये (देवान्) विद्वान् अतिथियों को जिससे (आ, वक्षि) अच्छे प्रकार पहुँचाते हो, इससे हम लोगों से सत्कार करने योग्य हो ॥११॥
Essence
गृहस्थों को चाहिये कि दूर स्थित भी उत्तम अतिथियों को उत्तम वाहनों पर बैठाकर उपदेश के लिये लावें और अन्न आदि से उनका सत्कार करें ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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