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Rigveda Mandal 4 / Sukta 9 / Mantra 1

58 Sukta
8 Mantra
4/9/1
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्ने॑ मृ॒ळ म॒हाँ अ॑सि॒ य ई॒मा दे॑व॒युं जन॑म्। इ॒येथ॑ ब॒र्हिरा॒सद॑म् ॥१॥

अग्ने॑ । मृ॒ळ । म॒हान् । अ॒सि॒ । यः । ई॒म् । आ । दे॒व॒ऽयुम् । जन॑म् । इ॒येथ॑ । ब॒र्हिः । आ॒ऽसद॑म् ॥

Mantra without Swara
अग्ने मृळ महाँ असि य ईमा देवयुं जनम्। इयेथ बर्हिरासदम् ॥

अग्ने। मृळ। महान्। असि। यः। ईम्। आ। देवऽयुम्। जनम्। इयेथ। बर्हिः। आऽसदम्॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 9 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रकाशमान ! (यः) जो आप (बर्हिः) उत्तम आसन को (आसदम्) बैठनेवाला (देवयुम्) अपने को विद्वानों की कामना कर (जनम्) प्रसिद्ध विद्वान् को (ईम्) सब प्रकार (आ, इयेथ) प्राप्त होते हो, इससे (महान्) महत्त्व से युक्त (असि) हो इससे हमें (मृळ) सुखी कीजिये ॥१॥
Essence
जो पुरुष विद्वानों के सङ्ग से विद्या की कामना करता और विद्या को प्राप्त होकर मनुष्य आदिकों को सुख देता है, वही आसन आदि से प्रतिष्ठा देने योग्य होता है ॥१॥
Subject
अब आठ ऋचावाले नवमें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के सदृश होने से विद्वान् का सत्कार कहते हैं ॥