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Rigveda Mandal 4 / Sukta 8 / Mantra 7

58 Sukta
8 Mantra
4/8/7
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒स्मे रायो॑ दि॒वेदि॑वे॒ सं च॑रन्तु पुरु॒स्पृहः॑। अ॒स्मे वाजा॑स ईरताम् ॥७॥

अ॒स्मे इति॑ । रायः॑ । दि॒वेऽदि॑वे । सम् । च॒र॒न्तु॒ । पु॒रु॒ऽस्पृहः॑ । अ॒स्मे इति॑ । वाजा॑सः । ई॒र॒ता॒म् ॥

Mantra without Swara
अस्मे रायो दिवेदिवे सं चरन्तु पुरुस्पृहः। अस्मे वाजास ईरताम् ॥

अस्मे इति। रायः। दिवेऽदिवे। सम्। चरन्तु। पुरुस्पृहः। अस्मे इति। वाजासः। ईरताम्॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 8 Mantra » 7

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Meaning
मनुष्य लोग (दिवेदिवे) प्रतिदिन (अस्मे) हम लोगों में (पुरुस्पृहः) बहुतों से चाहने योग्य (रायः) श्रेष्ठ लक्ष्मियाँ (सम्, चरन्तु) विलसें और (वाजासः) अन्न आदि ऐश्वर्य्यों के योग (अस्मे) हम लोगों को (ईरताम्) प्राप्त हों, ऐसी अभिलाषा करो ॥७॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि सदा ही पुरुषार्थ से धन, अन्न, राज्य, प्रतिष्ठा और विद्या आदि उत्तम गुणों की उन्नति होती है, इस प्रकार निरन्तर इच्छा करनी चाहिये ॥७॥
Subject
अब विद्वानों के पुरुषार्थ का फल कहते हैं ॥

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