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Rigveda Mandal 4 / Sukta 8 / Mantra 6

58 Sukta
8 Mantra
4/8/6
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ते रा॒या ते सु॒वीर्यैः॑ सस॒वांसो॒ वि शृ॑ण्विरे। ये अ॒ग्ना द॑धि॒रे दुवः॑ ॥६॥

ते । रा॒या । ते । सु॒ऽवीर्यैः॑ । स॒स॒ऽवांसः॑ । वि । शृ॒ण्वि॒रे॒ । ये । अ॒ग्ना । द॒धि॒रे । दुवः॑ ॥

Mantra without Swara
ते राया ते सुवीर्यैः ससवांसो वि शृण्विरे। ये अग्ना दधिरे दुवः ॥

ते। राया। ते। सुऽवीर्यैः। ससऽवांसः वि। शृण्विरे। ये। अग्ना। दधिरे। दुवः॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 8 Mantra » 6

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Meaning
(ये) जो विद्वान् लोग (अग्ना) बिजुलीरूप अग्नि में (दुवः) अभ्यास सेवन को (दधिरे) धारण करते और गुणों को (वि, शृण्विरे) सुनते हैं (ते) वे (राया) धन के साथ (ते) वे (सुवीर्यैः) उत्तम पराक्रम और बलवालों के साथ (ससवांसः) शयन करते हुए से आनन्दित होते हैं ॥६॥
Essence
मनुष्य जब तक अग्नि आदि पदार्थों की विद्या का श्रवण और सेवन नहीं करते हैं, तब तक धनाढ्य और पूर्ण बलवाले हो नहीं सकते हैं और जैसे सुख से सोते हुए आनन्द को प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार अग्नि आदि विद्या को प्राप्त हुए दारिद्र्य का नाश करके धन और बल से सदा ही सुखी होते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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