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Rigveda Mandal 4 / Sukta 7 / Mantra 8

58 Sukta
11 Mantra
4/7/8
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वेर॑ध्व॒रस्य॑ दू॒त्या॑नि वि॒द्वानु॒भे अ॒न्ता रोद॑सी संचिकि॒त्वान्। दू॒त ई॑यसे प्र॒दिव॑ उरा॒णो वि॒दुष्ट॑रो दि॒व आ॒रोध॑नानि ॥८॥

वेः । अ॒ध्व॒रस्य॑ । दू॒त्या॑नि । वि॒द्वान् । उ॒भे इति॑ । अ॒न्तरिति॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । स॒म्ऽचि॒कि॒त्वान् । दू॒तः । ई॒य॒से॒ । प्र॒ऽदिवः॑ । उ॒रा॒णः । वि॒दुःऽत॑रः । दि॒वः । आ॒ऽरोध॑नानि ॥

Mantra without Swara
वेरध्वरस्य दूत्यानि विद्वानुभे अन्ता रोदसी संचिकित्वान्। दूत ईयसे प्रदिव उराणो विदुष्टरो दिव आरोधनानि ॥

वेः। अध्वरस्य। दूत्यानि। विद्वान्। उभे इति। अन्तरिति। रोदसी इति। सम्ऽचिकित्वान्। दूतः। ईयसे। प्रऽदिवः। उराणः। विदुःऽतरः। दिवः। आऽरोधनानि॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 7 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वन् (सञ्चिकित्वान्) उत्तम प्रकार कार्य करने की इच्छा करनेवाले (विद्वान्) विद्यावान् पुरुष ! (विदुष्टरः) अत्यन्त ज्ञाता हुए आप जो (वेः) व्याप्त (अध्वरस्य) न नष्ट करने योग्य व्यवहार के (दूत्यानि) संदेश पहुँचानेवाले के सदृश कर्म्मों को और (अन्तः) मध्य में (उभे) दोनों (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (दूतः) संदेश पहुँचानेवाला (प्रदिवः) प्राचीन (उराणः) बहुत कार्य करता हुआ जाता है, उसको जानके (दिवः) प्रकाश के (आरोधनानि) सब प्रकार के ग्रहण करने को (ईयसे) प्राप्त होते हो, इससे सुख को प्राप्त होते हो ॥८॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो बिजुली रूप अग्नि सम्पूर्ण शिल्पिजन का दूत के सदृश प्रेरणा करनेवाला, अनादि काल से सिद्ध और सम्पूर्ण पदार्थों में व्याप्त है, उसकी उत्पत्ति और निरोध से बहुत कार्य्यों को सिद्ध करके ऐश्वर्य्य को प्राप्त होओ ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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