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Rigveda Mandal 4 / Sukta 7 / Mantra 6

58 Sukta
11 Mantra
4/7/6
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तं शश्व॑तीषु मा॒तृषु॒ वन॒ आ वी॒तमश्रि॑तम्। चि॒त्रं सन्तं॒ गुहा॑ हि॒तं सु॒वेदं॑ कूचिद॒र्थिन॑म् ॥६॥

तम् । शश्व॑तीषु । मा॒तृषु॑ । वने॑ । आ । वी॒तम् । अश्रि॑तम् । चि॒त्रम् । सन्त॑म् । गुहा॑ । हि॒तम् । सु॒ऽवेद॑म् । कू॒चि॒त्ऽअ॒र्थिन॑म् ॥

Mantra without Swara
तं शश्वतीषु मातृषु वन आ वीतमश्रितम्। चित्रं सन्तं गुहा हितं सुवेदं कूचिदर्थिनम् ॥

तम्। शश्वतीषु। मातृषु। वने। आ। वीतम्। अश्रितम्। चित्रम्। सन्तम्। गुहा। हितम्। सुऽवेदम्। कूचित्ऽअर्थिनम्॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 7 Mantra » 1

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Meaning
हे विद्वानो ! आप लोग (शश्वतीषु) अनादिकाल से वर्त्तमान (मातृषु) आकाश आदि पदार्थों में और (वने) किरण में (सन्तम्) विद्यमान (गुहा) बुद्धि में (हितम्) स्थित (सुवेदम्) उत्तम विज्ञान जिसका (कूचिदर्थिनम्) जो कहीं बहुत अर्थों से युक्त (अश्रितम्) और नहीं सेवन किया गया (आ, वीतम्) व्याप्त (तम्) उस (चित्रम्) अद्भुत गुण, कर्म, स्वभाववाले बिजुली नामक अग्नि को जान के कार्यों को सिद्ध करो ॥६॥
Essence
जो मनुष्य सर्व पदार्थों में अलग ही अलग वर्त्तमान अग्नि को तत्त्व से जानते हैं, वे सब काम साध सकते हैं ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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