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Rigveda Mandal 4 / Sukta 7 / Mantra 3

58 Sukta
11 Mantra
4/7/3
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ऋ॒तावा॑नं॒ विचे॑तसं॒ पश्य॑न्तो॒ द्यामि॑व॒ स्तृभिः॑। विश्वे॑षामध्व॒राणां॑ हस्क॒र्तारं॒ दमे॑दमे ॥३॥

ऋ॒तऽवा॑नम् । विऽचे॑तसम् । पश्य॑न्तः । द्याम्ऽइ॑व । स्तृऽभिः॑ । विश्वे॑षाम् । अ॒ध्व॒राणा॑म् । ह॒स्क॒र्तार॑म् । दमे॑ऽदमे ॥

Mantra without Swara
ऋतावानं विचेतसं पश्यन्तो द्यामिव स्तृभिः। विश्वेषामध्वराणां हस्कर्तारं दमेदमे ॥

ऋतऽवानम्। विऽचेतसम्। पश्यन्तः। द्याम्ऽइव। स्तृऽभिः। विश्वेषाम्। अध्वराणाम्। हस्कर्तारम्। दमेऽदमे॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
जो मनुष्य लोग (विश्वेषाम्) सम्पूर्ण (अध्वराणाम्) नहीं हिंसा करने योग्य यज्ञों के (स्तृभिः) नक्षत्रों से (द्यामिव) सूर्य्य के सदृश (दमेदमे) घर-घर में (हस्कर्त्तारम्) प्रकाश करनेवाले (विचेतसम्) जिससे विगतचित्त होता (ऋतावानम्) जिसमें सत्य विद्यमान उसको (पश्यन्तः) देखते हुए ग्रहण करे हुए हैं, वे उत्तम प्रकार शोभित होते हैं ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो लोग चेतनारहित कारण से युक्त प्रत्येक गृह के प्रवेश करनेवाले को जानते हैं, वे सूर्य के प्रकाश में चन्द्र आदिकों के सदृश संसार में प्रकाशित होते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥