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Rigveda Mandal 4 / Sukta 7 / Mantra 2

58 Sukta
11 Mantra
4/7/2
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अग्ने॑ क॒दा त॑ आनु॒षग्भुव॑द्दे॒वस्य॒ चेत॑नम्। अधा॒ हि त्वा॑ जगृभ्रि॒रे मर्ता॑सो वि॒क्ष्वीड्य॑म् ॥२॥

अग्ने॑ । क॒दा । ते॒ । आ॒नु॒षक् । भुव॑त् । दे॒वस्य॑ । चेत॑नम् । अध॑ । हि । त्वा॒ । ज॒गृ॒भ्रि॒रे । मर्ता॑सः । वि॒क्षु ईड्य॑म् ॥

Mantra without Swara
अग्ने कदा त आनुषग्भुवद्देवस्य चेतनम्। अधा हि त्वा जगृभ्रिरे मर्तासो विक्ष्वीड्यम् ॥

अग्ने। कदा। ते। आनुषक्। भुवत्। देवस्य। चेतनम्। अध। हि। त्वा। जगृभ्रिरे। मर्तासः। विक्षु । ईड्यम्॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 6 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) परमात्मन् ! (देवस्य) सुख देनेवाले और सर्वत्र प्रकाशमान (ते) आपके मनुष्य (कदा) किस काल में (आनुषक्) अनुकूल (भुवत्) हो (अधा) इसके अनन्तर (मर्त्तासः) मनुष्य लोग (हि) निश्चय से (विक्षु) मनुष्यरूप प्रजाओं में (ईड्यम्) स्तुति करने योग्य (चेतनम्) अनन्त विज्ञान आदि से युक्त (त्वा) आपको कब (जगृभ्रिरे) ग्रहण करें, ऐसी हम लोग इच्छा करें ॥२॥
Essence
हे परमेश्वर ! हम लोग आपकी निरन्तर प्रार्थना करें और आपकी कृपा से ये सब मनुष्य आपके भक्त, आपकी आज्ञा के अनुकूल और आपके उपासक कब होंगे। हे कृपालो अन्तर्यामिन् ! दया करके सब को अपने में प्रीतिमान् शीघ्र करो ॥२॥
Subject
फिर अग्निपदवाच्य ईश्वर विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥