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Rigveda Mandal 4 / Sukta 7 / Mantra 11

58 Sukta
11 Mantra
4/7/11
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तृ॒षु यदन्ना॑ तृ॒षुणा॑ व॒वक्ष॑ तृ॒षुं दू॒तं कृ॑णुते य॒ह्वो अ॒ग्निः। वात॑स्य मे॒ळिं स॑चते नि॒जूर्व॑न्ना॒शुं न वा॑जयते हि॒न्वे अर्वा॑ ॥११॥

तृ॒षु । यत् । अन्ना॑ । तृ॒षुणा॑ । व॒वक्ष॑ । तृ॒षुम् । दू॒तम् । कृ॒णु॒ते॒ । य॒ह्वः । अ॒ग्निः । वात॑स्य । मे॒ळिम् । स॒च॒ते॒ । नि॒ऽजूर्व॑न् । आ॒शुम् । न । वा॒ज॒य॒ते॒ । हि॒न्वे । अर्वा॑ ॥

Mantra without Swara
तृषु यदन्ना तृषुणा ववक्ष तृषुं दूतं कृणुते यह्वो अग्निः। वातस्य मेळिं सचते निजूर्वन्नाशुं न वाजयते हिन्वे अर्वा ॥

तृषु। यत्। अन्ना। तृषुणा। ववक्ष। तृषुम्। दूतम्। कृणुते। यह्वः। अग्निः। वातस्य। मेळिम्। सचते। निऽजूर्वन्। आशुम्। न। वाजयते। हिन्वे। अर्वा॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 7 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (यह्वः) बड़े (अर्वा) घोड़े के सदृश (निजूर्वन्) निरन्तर शीघ्र चलती हुई (अग्निः) बिजुली (तृषुणा) शीघ्रता से युक्त (अन्ना) अन्न आदिक पदार्थों को (तृषु) शीघ्र (ववक्ष) प्राप्त कराती है (तृषुम्) शीघ्र कार्य्यकारी (दूतम्) समाचार पहुँचानेवाले जन के सदृश अपने प्रताप को (कृणुते) करती है और (वातस्य) पवन के (मेळिम्) सङ्गम का (सचते) सम्बन्ध करती है जिसको विद्वान् जन (आशुम्) शीघ्र चलनेवाले घोड़े के (न) सदृश (वाजयते) चलाता है, मैं (हिन्वे) चलाऊँ, उसको आप लोग जानिये ॥११॥
Essence
जो मनुष्य बिजुली और वायु आदि के योग की विद्या को जानें तो वे दूत और घोड़े के सदृश दूर वाहन और समाचार को पहुँचा सकें ॥११॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥११॥ यह सातवाँ सूक्त और सातवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर शिल्पि विद्वान् के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥