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Rigveda Mandal 4 / Sukta 7 / Mantra 10

58 Sukta
11 Mantra
4/7/10
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स॒द्यो जा॒तस्य॒ ददृ॑शान॒मोजो॒ यद॑स्य॒ वातो॑ अनु॒वाति॑ शो॒चिः। वृ॒णक्ति॑ ति॒ग्माम॑त॒सेषु॑ जि॒ह्वां स्थि॒रा चि॒दन्ना॑ दयते॒ वि जम्भैः॑ ॥१०॥

स॒द्यः । जा॒तस्य॑ । ददृ॑शानम् । ओजः॑ । यत् । अ॒स्य॒ । वातः॑ । अ॒नु॒ऽवाति॑ । शो॒चिः । वृ॒णक्ति॑ । ति॒ग्माम् । अ॒त॒सेषु॑ । जि॒ह्वाम् । स्थि॒रा । चि॒त् । अन्ना॑ । द॒य॒ते॒ । वि । जम्भैः॑ ॥

Mantra without Swara
सद्यो जातस्य ददृशानमोजो यदस्य वातो अनुवाति शोचिः। वृणक्ति तिग्मामतसेषु जिह्वां स्थिरा चिदन्ना दयते वि जम्भैः ॥

सद्यः। जातस्य। ददृशानम्। ओजः। यत्। अस्य। वातः। अनुऽवाति। शोचिः। वृणक्ति। तिग्माम्। अतसेषु। जिह्वाम्। स्थिरा। चित्। अन्ना। दयते। वि। जम्भैः॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 7 Mantra » 5

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Meaning
हे विद्वान् जनो ! (अस्य) इस (सद्यः) शीघ्र (जातस्य) उत्पन्न हुए विद्युत् रूप अग्निप्रताप के (यत्) जिस (ददृशानम्) देखने योग्य (ओजः) वेगयुक्त बल के (वातः) वायु (अनुवाति) पीछे चलता है, जो इस साधारण अग्नि को (शोचिः) प्रज्वलित लपट को (अतसेषु) वृक्ष आदिकों में (तिग्माम्) तीव्र गति को और (जिह्वाम्) वाणी को (वृणक्ति) सेवन करता है और जो (वि, जम्भैः) गमनों के आक्षेपों से (चित्) भी (स्थिरा) दृढ़ (अन्ना) भोजन करने योग्य पदार्थों को (दयते) देता है, उस बिजुली रूप अग्नि को जान के कार्यों में प्रयुक्त करो ॥१०॥
Essence
जो शिल्पीजन पदार्थों से बिजुली को उत्पन्न करें तो वह बिजुली देखने योग्य पराक्रम और वेग को दिखा के अनेक प्रकार के ऐश्वर्य्यों को देती है ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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