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Rigveda Mandal 4 / Sukta 7 / Mantra 1

58 Sukta
11 Mantra
4/7/1
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यमि॒ह प्र॑थ॒मो धा॑यि धा॒तृभि॒र्होता॒ यजि॑ष्ठो अध्व॒रेष्वीड्यः॑। यमप्न॑वानो॒ भृग॑वो विरुरु॒चुर्वने॑षु चि॒त्रं वि॒भ्वं॑ वि॒शेवि॑शे ॥१॥

अ॒यम् । इ॒ह । प्र॒थ॒मः । धा॒यि॒ । धा॒तृऽभिः॑ । होता॑ । यजि॑ष्ठः । अ॒ध्व॒रेषु॑ । ईड्यः॑ । यम् । अप्न॑वानः । भृग॑वः । वि॒ऽरु॒रु॒चुः । वने॑षु । चि॒त्रम् । वि॒ऽभ्व॑म् । वि॒शेऽवि॑शे ॥

Mantra without Swara
अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः। यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभ्वं विशेविशे ॥

अयम्। इह। प्रथमः। धायि। धातृऽभिः। होता। यजिष्ठः। अध्वरेषु। ईड्यः। यम्। अप्नवानः। भृगवः। विऽरुरुचुः। वनेषु। चित्रम्। विऽभ्वम्। विशेऽविशे॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 6 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (इह) इस संसार में (धातृभिः) धारण करनेवालों से जो (अयम्) यह (प्रथमः) पहिला (होता) देने और (यजिष्ठः) अत्यन्त मेल करनेवाला (अध्वरेषु) नहीं हिंसा करने योग्य यज्ञों में (ईड्यः) स्तुति करने योग्य (धायि) धारण किया गया जिसको (विशेविशे) प्रजा-प्रजा के लिये (यम्) जिस (चित्रम्) अद्भुत (विभ्वम्) व्यापक परमात्मा को (अप्नवानः) पुत्र और पौत्रादिकों से युक्त (भृगवः) परिपक्व विज्ञानवाले लोग (वनेषु) याचना करने योग्य जङ्गलों में (विरुरुचुः) विशेष करके प्रकाशित करते अर्थात् अपने चित्त में रमाते हैं, उस परमात्मा का आप लोग ध्यान करो ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! इस संसार में परमेश्वर ही का आप लोगों को ध्यान करना योग्य है और जिसकी उपासना करके सांसारिक और पारमार्थिक सुख को प्राप्त होओगे, वही ईश्वर इस संसार में पूजा करने योग्य जानना चाहिये ॥१॥
Subject
अब एकादश ऋचावाले सप्तम सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में सर्वगत अग्निशब्दार्थवाच्य व्यापक परमेश्वर के विषय को कहते हैं ॥

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