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Rigveda Mandal 4 / Sukta 6 / Mantra 7

58 Sukta
11 Mantra
4/6/7
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न यस्य॒ सातु॒र्जनि॑तो॒रवा॑रि॒ न मा॒तरा॑पि॒तरा॒ नू चि॑दि॒ष्टौ। अधा॑ मि॒त्रो न सुधि॑तः पाव॒को॒३॒॑ग्निर्दी॑दाय॒ मानु॑षीषु वि॒क्षु ॥७॥

न । यस्य॑ । सातुः॑ । जनि॑तोः । अवा॑रि । न । मा॒तरा॑पि॒तरा॑ । नु । चि॒त् । इ॒ष्टौ । अध॑ । मि॒त्रः । न । सुऽधि॑तः । पा॒व॒कः । अ॒ग्निः । दी॒दा॒य॒ । मानु॑षीषु । वि॒क्षु ॥

Mantra without Swara
न यस्य सातुर्जनितोरवारि न मातरापितरा नू चिदिष्टौ। अधा मित्रो न सुधितः पावको३ग्निर्दीदाय मानुषीषु विक्षु ॥

न। यस्य। सातुः। जनितोः। अवारि। न। मातरापितरा। नु। चित्। इष्टौ। अध। मित्रः। न। सुऽधितः। पावकः। अग्निः। दीदाय। मानुषीषु। विक्षु॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 5 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यस्य) जिस (सातुः) सत्य और असत्य के विभाग करनेवाले के (जनितोः) माता और पिता का प्रिय (न) नहीं (अवारि) स्वीकार किया जाता है और (चित्) जिसके (मातारापितरा) माता और पिता (इष्टौ) पूजा करने योग्य (न) नहीं स्वीकार किये जाते हैं, वह दुःखी होता (अधा) इसके अनन्तर जिसके माता और पिता सत्कृत होवें (सुधितः) वह उत्तम प्रकार हितकारी (मित्रः) मित्र के (न) और (अग्निः) अग्नि के सदृश (पावकः) पवित्र (मानुषीषु) मनुष्य संबन्धिनी (विक्षु) प्रजाओं में (नु) शीघ्र (दीदाय) प्रकाशित होता है ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जिस पुत्र के विद्यमान रहने पर माता और पिता को दुःख होता और सत्कार नहीं होता है, वह भाग्यहीन निरन्तर पीड़ित होता है और जिस पुत्र की उत्तम सेवा से माता पिता प्रसन्न होते हैं, उसकी प्रजाओं में प्रशंसा और उसको सुख होता है ॥७॥
Subject
अब ईश्वरभाव में माता पिता के सेवाधर्म को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥