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Rigveda Mandal 4 / Sukta 6 / Mantra 6

58 Sukta
11 Mantra
4/6/6
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
भ॒द्रा ते॑ अग्ने स्वनीक सं॒दृग्घो॒रस्य॑ स॒तो विषु॑णस्य॒ चारुः॑। न यत्ते॑ शो॒चिस्तम॑सा॒ वर॑न्त॒ न ध्व॒स्मान॑स्त॒न्वी॒३॒॑ रेप॒ आ धुः॑ ॥६॥

भ॒द्रा । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽअ॒नी॒क॒ । स॒म्ऽदृक् । घो॒रस्य॑ । स॒तः । विषु॑णस्य । चारुः॑ । न । यत् । ते॒ । शो॒चिः । तम॑सा । वर॑न्त । न । ध्व॒स्मानः॑ । त॒न्वि॑ । रेपः॑ । आ । धु॒रिति॑ ॥

Mantra without Swara
भद्रा ते अग्ने स्वनीक संदृग्घोरस्य सतो विषुणस्य चारुः। न यत्ते शोचिस्तमसा वरन्त न ध्वस्मानस्तन्वी३ रेप आ धुः ॥

भद्रा। ते। अग्ने। सुऽअनीक। सम्ऽदृक्। घोरस्य। सतः। विषुणस्य। चारुः। न। यत्। ते। शोचिः। तमसा। वरन्त। न। ध्वस्मानः। तन्वि। रेपः। आ। धुरिति धुः॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 5 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (स्वनीक) उत्तम सेनायुक्त (अग्ने) बिजुली के समान वर्त्तमान ! जो (ते) आपकी (घोरस्य) दुष्ट (सतः) श्रेष्ठ पुरुष की तथा (विषुणस्य) विषम की (चारुः) सुन्दर (भद्रा) कल्याण करनेवाली (संदृक्) समान दृष्टि है (यत्) जो (ते) आपका (शोचिः) प्रकाश (तमसा) रात्रि से (ध्वस्मानः) नाश करनेवाले शत्रु (न) नहीं (वरन्त) निवारण करते हैं, जो आपकी (तन्वि) विस्तीर्ण नीति उससे (रेपः) अपराध (न) नहीं (आ, धुः) सब प्रकार धारण करे, वह आप हम लोगों के राजा हूजिये ॥६॥
Essence
जिस राजा की पक्षपातरहित प्रवृत्ति और जिसकी विस्तीर्ण नीति अविच्छिन्न वर्त्तमान है, उसके राज्य में कोई भी अपराध करने की इच्छा न करे ॥६॥
Subject
अब ईश्वरता लेकर राजगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥