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Rigveda Mandal 4 / Sukta 6 / Mantra 5

58 Sukta
11 Mantra
4/6/5
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
परि॒ त्मना॑ मि॒तद्रु॑रेति॒ होता॒ग्निर्म॒न्द्रो मधु॑वचा ऋ॒तावा॑। द्रव॑न्त्यस्य वा॒जिनो॒ न शोका॒ भय॑न्ते॒ विश्वा॒ भुव॑ना॒ यदभ्रा॑ट् ॥५॥

परि॑ । त्मना॑ । मि॒तऽद्रुः॑ । ए॒ति॒ । होता॑ । अ॒ग्निः । म॒न्द्रः । मधु॑ऽवचाः । ऋ॒तऽवा॑ । द्रव॑न्ति । अ॒स्य॒ । वा॒जिनः॑ । न । शोकाः॑ । भय॑न्ते । विश्वा॑ । भुव॑ना । यत् । अभ्रा॑ट् ॥

Mantra without Swara
परि त्मना मितद्रुरेति होताग्निर्मन्द्रो मधुवचा ऋतावा। द्रवन्त्यस्य वाजिनो न शोका भयन्ते विश्वा भुवना यदभ्राट् ॥

परि। त्मना। मितऽद्रुः। एति। होता। अग्निः। मन्द्रः। मधुऽवचाः। ऋतऽवा। द्रवन्ति। अस्य। वाजिनः। न। शोकाः। भयन्ते। विश्वा। भुवना। यत्। अभ्राट्॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 4 Mantra » 5

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Meaning
जैसे (अस्य) इस सूर्य के (वाजिनः) घोड़े के (न) तुल्य (शोकाः) प्रकाश (द्रवन्ति) दौड़ते हैं जो (अभ्राट्) दीप्त होता है (यत्) जिससे (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवना) जीवों के ठहरने के अधिकरण लोकलोकान्तर (भयन्ते) कँपते हैं, उस प्रकार वर्त्तमान जो पुरुष (ऋतावा) सत्य का विभाग करनेवाला (मधुवचाः) मधुरवाणीयुक्त (अग्निः) अग्नि के सदृश (होता) यज्ञ करनेवाला (मन्द्रः) आनन्ददाता वा आनन्दित (मितद्रुः) परिमाणपूर्वक चलनेवाला (त्मना) अपने से (परि, एति) प्राप्त होता है, वह सुख को प्राप्त होता है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जिस परमात्मा का सब जगह प्रकाश और जिससे सब डरते हैं, उसके विज्ञान के लिये सत्य का आचरण और योगाभ्यास सब को करना चाहिये ॥५॥
Subject
अब ईश्वरविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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