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Rigveda Mandal 4 / Sukta 6 / Mantra 3

58 Sukta
11 Mantra
4/6/3
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
य॒ता सु॑जू॒र्णी रा॒तिनी॑ घृ॒ताची॑ प्रदक्षि॒णिद्दे॒वता॑तिमुरा॒णः। उदु॒ स्वरु॑र्नव॒जा नाक्रः प॒श्वो अ॑नक्ति॒ सुधि॑तः सु॒मेकः॑ ॥३॥

य॒ता । सु॒ऽजू॒र्णिः । रा॒तिनी॑ । घृ॒ताची॑ । प्र॒ऽद॒क्षि॒णित् । दे॒वऽता॑तिम् । उ॒रा॒णः । उत् । ऊँ॒ इति॑ । स्वरुः॑ । न॒व॒ऽजाः । न । अ॒क्रः । प॒श्वः । अ॒न॒क्ति॒ । सुऽधि॑तः । सु॒ऽमेकः॑ ॥

Mantra without Swara
यता सुजूर्णी रातिनी घृताची प्रदक्षिणिद्देवतातिमुराणः। उदु स्वरुर्नवजा नाक्रः पश्वो अनक्ति सुधितः सुमेकः ॥

यता। सुऽजूर्णिः। रातिनी। घृताची। प्रऽदक्षिणित्। देवऽतातिम्। उराणः। उत्। ऊम् इति। स्वरुः। नवऽजाः। न। अक्रः। पश्वः। अनक्ति। सुऽधितः। सुऽमेकः॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 4 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (सुजूर्णिः) उत्तम प्रकार शीघ्रता करनेवाली (यता) प्राप्त (रातिनी) बहुत देनेवाले जिसके ऐसी (प्रदक्षिणित्) दहिनी ओर प्राप्त होनेवाली (घृताची) रात्रि (देवतातिम्) श्रेष्ठ गुणों से युक्त वेला को (उत्, अनक्ति) शोभा करती है और जैसे उसको (उराणः) बहुतों को जिलानेवाला (सुधितः) उत्तम प्रकार धारण किये हुए (सुमेकः) सुन्दर प्रकाशमान (अक्रः) नहीं किञ्चित् चलनेवाला, किन्तु वेग से जानेवाला (नवजाः) नवीनों में उत्पन्न सूर्य्य (स्वरुः) उपदेश देनेवाले के (न) समान शोभा करता है, वैसे विद्वान् वर्त्ताव करें (उ) और वह (पश्वः) पशुओं की न हिंसा करे ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। उपदेशक लोग रात्रि और दिन में सभों के करने योग्य सेवा का उपदेश देवें, जिससे कि शयन जागरण आदि से युक्त आहार और विहारों को करके अपने हितों को सिद्ध करनेवाले होवें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥