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Rigveda Mandal 4 / Sukta 6 / Mantra 2

58 Sukta
11 Mantra
4/6/2
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अमू॑रो॒ होता॒ न्य॑सादि वि॒क्ष्व१॒॑ग्निर्म॒न्द्रो वि॒दथे॑षु॒ प्रचे॑ताः। ऊ॒र्ध्वं भा॒नुं स॑वि॒तेवा॑श्रे॒न्मेते॑व धू॒मं स्त॑भाय॒दुप॒ द्याम् ॥२॥

अमू॑रः । होता॑ । नि । अ॒सा॒दि॒ । वि॒क्षु । अ॒ग्निः । म॒न्द्रः । वि॒दथे॑षु । प्रऽचे॑ताः । ऊ॒र्ध्वम् । भा॒नुम् । स॒वि॒ताऽइ॑व । अ॒श्रे॒त् । मेता॑ऽइव । धू॒मम् । स्त॒भा॒य॒त् । उप॑ । द्याम् ॥

Mantra without Swara
अमूरो होता न्यसादि विक्ष्व१ग्निर्मन्द्रो विदथेषु प्रचेताः। ऊर्ध्वं भानुं सवितेवाश्रेन्मेतेव धूमं स्तभायदुप द्याम् ॥

अमूरः। होता। नि। असादि। विक्षु। अग्निः। मन्द्रः। विदथेषु। प्रऽचेताः। ऊर्ध्वम्। भानुम्। सविताऽइव। अश्रेत्। मेताऽइव। धूमम्। स्तभायत्। उप। द्याम्॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 4 Mantra » 2

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Meaning
मनुष्यों को चाहिये कि जो (अमूरः) मूर्खपन से रहित विद्वान् जन होता हुआ (होता) ग्रहण करनेवाला (विक्षु) प्रजाओं और (विदथेषु) संग्रामों में (अग्निः) अग्नि के सदृश (मन्द्रः) आनन्द देनेवाला (प्रचेताः) बुद्धिमान् वा बुद्धिदाता (द्याम्) प्रकाश और (उर्द्ध्वम्) ऊपर वर्त्तमान (भानुम्) किरण को (सवितेव) सूर्य्य के सदृश (धूमम्) धुएँ को (मेतेव) यथार्थ ज्ञानवाले के सदृश (स्तभायत्) रोकता है, न्याय का (अश्रेत्) आश्रय करे, वही राज्य कर्म्म में (उप, नि, असादि) स्थित होवे तो बहुत सुख को प्राप्त होवे ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश प्रतापी अग्नि के सदृश दुष्टों के दाहक और न्याय और नम्रता से प्रजाओं में चन्द्रमा के सदृश संग्राम में जीतनेवाले राजा को संस्थापित करें तो कभी दुःख को न प्राप्त होवें ॥२॥
Subject
अब विद्वानों के कर्त्तव्य को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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