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Rigveda Mandal 4 / Sukta 6 / Mantra 11

58 Sukta
11 Mantra
4/6/11
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अका॑रि॒ ब्रह्म॑ समिधान॒ तुभ्यं॒ शंसा॑त्यु॒क्थं यज॑ते॒ व्यू॑ धाः। होता॑रम॒ग्निं मनु॑षो॒ नि षे॑दुर्नम॒स्यन्त॑ उ॒शिजः॒ शंस॑मा॒योः ॥११॥

अका॑रि । ब्रह्म॑ । स॒म्ऽइ॒धा॒न॒ । तुभ्य॑म् । शंसा॑ति । उ॒क्थम् । यज॑ते । वि । ऊँ॒ इति॑ । धाः॒ । होता॑रम् । अ॒ग्निम् । मनु॑षः । नि । से॒दुः॒ । न॒म॒स्यन्तः॑ । उ॒शिजः॑ । शंस॑म् । आ॒योः ॥

Mantra without Swara
अकारि ब्रह्म समिधान तुभ्यं शंसात्युक्थं यजते व्यू धाः। होतारमग्निं मनुषो नि षेदुर्नमस्यन्त उशिजः शंसमायोः ॥

अकारि। ब्रह्म। सम्ऽइधान। तुभ्यम्। शंसाति। उक्थम्। यजते। वि। ऊम् इति। धाः। होतारम्। अग्निम्। मनुषः। नि। सेदुः। नमस्यन्तः। उशिजः। शंसम्। आयोः॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 5 Mantra » 6

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Meaning
हे (समिधान) प्रकाशमान विद्वन् ! जो (नमस्यन्तः) नम्रता और (उशिजः) कामना करते हुए (मनुषः) मनुष्य (आयोः) जीवन की (शंसम्) प्रशंसा को और (होतारम्) देनेवाले को (अग्निम्) अग्नि के सदृश (नि, सेदुः) प्राप्त होते हैं और जो (तुभ्यम्) आपके लिये (उक्थम्) स्तुति करने योग्य (ब्रह्म) बड़े धन की (शंसाति) प्रशंसा करे (यजते) तथा विशेषता ही से मिलते हुए के लिये जिनसे आप ने ऐश्वर्य्य (अकारि) किया उनको (वि, उ, धाः) धारण कीजिये ॥११॥
Essence
हे विद्वन् ! वा राजन् ! जो आपके लिये ऐश्वर्य की कामना करते हुए परमेश्वर और विद्वानों को नमस्कार करते हैं, वे निरन्तर प्रशंसित होते हैं ॥११॥ इस सूक्त में विद्वान् और ईश्वर के गुण वर्णन करने से इस के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥११॥ यह छठवाँ सूक्त और पाँचवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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