Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 4 / Sukta 58 / Mantra 5

58 Sukta
11 Mantra
4/58/5
Devata- अग्निः सूर्यो वाऽपो वा गावो वा घृतं वा Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ए॒ता अ॑र्षन्ति॒ हृद्या॑त्समु॒द्राच्छ॒तव्र॑जा रि॒पुणा॒ नाव॒चक्षे॑। घृ॒तस्य॒ धारा॑ अ॒भि चा॑कशीमि हिर॒ण्ययो॑ वेत॒सो मध्य॑ आसाम् ॥५॥

ए॒ताः । अ॒र्ष॒न्ति॒ । हृद्या॑त् । स॒मु॒द्रात् । श॒तऽव्र॑जाः । रि॒पुणा॑ । न । अ॒व॒ऽचक्षे॑ । घृ॒तस्य॑ । धाराः॑ । अ॒भि । चा॒क॒सी॒मि॒ । हि॒र॒ण्ययः॑ । वे॒त॒सः । मध्ये॑ । आ॒सा॒म् ॥

Mantra without Swara
एता अर्षन्ति हृद्यात्समुद्राच्छतव्रजा रिपुणा नावचक्षे। घृतस्य धारा अभि चाकशीमि हिरण्ययो वेतसो मध्य आसाम् ॥

एताः। अर्षन्ति। हृद्यात्। समुद्रात्। शतऽव्रजाः। रिपुणा। न। अवऽचक्षे। घृतस्य। धाराः। अभि। चाकशीमि। हिरण्ययः। वेतसः। मध्ये। आसाम् ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 10 Mantra » 5

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (आसाम्) इन धाराओं के (मध्ये) मध्य में (हिरण्ययः) तेजःस्वरूप वा सुवर्णस्वरूप (वेतसः) सुन्दर मैं जो (घृतस्य) जल की (एताः) ये (शतव्रजाः) अपरिमित गतिवाली (धाराः) धारायें (हृद्यात्) हृदय के प्रिय (समुद्रात्) अन्तरिक्ष से (अर्षन्ति) प्राप्त होती हैं, उनको (अवचक्षे) कहने को (अभि, चाकशीमि) प्रकाश करता हूँ और (रिपुणा) शत्रु के साथ (न) नहीं वसता हूँ, वैसे आप लोग जानो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! जैसे आकाश से गिरी हुई वर्षा सब जगत् का पालन करती हैं, वैसे ही आप लोगों से निकली हुई विज्ञान की वाणियाँ सब जगत् की रक्षा करती हैं ॥५॥
Subject
अब मेघविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.