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Rigveda Mandal 4 / Sukta 57 / Mantra 7

58 Sukta
8 Mantra
4/57/7
Devata- सीता Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इन्द्रः॒ सीतां॒ नि गृ॑ह्णातु॒ तां पू॒षानु॑ यच्छतु। स नः॒ पय॑स्वती दुहा॒मुत्त॑रामुत्तरां॒ समा॑म् ॥७॥

इन्द्रः॑ । सीता॑म् । नि । गृ॒ह्णा॒तु॒ । ताम् । पू॒षा । अनु॑ । य॒च्छ॒तु॒ । सा । नः॒ । पय॑स्वती । दु॒हा॒म् । उत्त॑राम्ऽउत्तराम् । समा॑म् ॥

Mantra without Swara
इन्द्रः सीतां नि गृह्णातु तां पूषानु यच्छतु। स नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम् ॥

इन्द्रः। सीताम्। नि। गृह्णातु। ताम्। पूषा। अनु। यच्छतु। सा। नः। पयस्वती। दुहाम्। उत्तराम्ऽउत्तराम्। समाम् ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 7

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Meaning
हे खेती करनेवाले जनो ! जो (पयस्वती) बहुत जल से युक्त (नः) हम लोगों के लिये (अनु, यच्छतु) अनुग्रह करे (सा) वह आप लोगों को भी प्राप्त हो और जिस (सीताम्) भूमि जुतानेवाले वस्तु को (इन्द्रः) भूमि को दारण करानेवाला (नि, गृह्णातु) ग्रहण करे (ताम्) उस (दुहाम्) प्रपूरण करनेवाली (उत्तरामुत्तराम्) फिर-फिर बनाई गई (समाम्) शुद्ध सीता अर्थात् भूमि जुतानेवाले वस्तु को (पूषा) पुष्टि करनेवाला देवे, उसका आप लोग भी संयोग करें ॥७॥
Essence
सब कृषिकर्म करनेवाले जन विद्वान् क्षेत्र जोतनेवालों का अनुकरण करके कृषि की वृद्धि को उत्पन्न करें ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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