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Rigveda Mandal 4 / Sukta 57 / Mantra 3

58 Sukta
8 Mantra
4/57/3
Devata- क्षेत्रपतिः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मधु॑मती॒रोष॑धी॒र्द्याव॒ आपो॒ मधु॑मन्नो भवत्व॒न्तरि॑क्षम्। क्षेत्र॑स्य॒ पति॒र्मधु॑मान्नो अ॒स्त्वरि॑ष्यन्तो॒ अन्वे॑नं चरेम ॥३॥

मधु॑ऽमतीः । ओष॑धीः । द्यावः॑ । आपः॑ । मधु॑ऽमत् । नः॒ । भ॒व॒तु॒ । अ॒न्तरि॑क्षम् । क्षेत्र॑स्य । पतिः॑ । मधु॑ऽमान् । नः॒ । अ॒स्तु॒ । अरि॑ष्यन्तः॑ । अनु॑ । ए॒न॒म् । च॒रे॒म॒ ॥

Mantra without Swara
मधुमतीरोषधीर्द्याव आपो मधुमन्नो भवत्वन्तरिक्षम्। क्षेत्रस्य पतिर्मधुमान्नो अस्त्वरिष्यन्तो अन्वेनं चरेम ॥

मधुऽमतीः। ओषधीः। द्यावः। आपः। मधुऽमत्। नः। भवतु। अन्तरिक्षम्। क्षेत्रस्य। पतिः। मधुऽमान्। नः। अस्तु। अरिष्यन्तः। अनु। एनम्। चरेम ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! (नः) हम लोगों के लिये (ओषधीः) यव आदि ओषधियाँ (द्यावः) सूर्य्य आदि प्रकाश और (आपः) जल (मधुमतीः) मधुर आदि गुणों से युक्त हों (अन्तरिक्षम्) आकाश (मधुमत्) मधुर आदि गुणों से युक्त (भवतु) हो (क्षेत्रस्य) अन्न के उत्पन्न होने की भूमि का (पतिः) स्वामी (नः) हम लोगों के लिये (मधुमान्) मधुर गुणवाला (अस्तु) हो और (अरिष्यन्तः) अन्यों के साथ नहीं हिंसा करनेवाले हम लोग (एनम्) इसको (अनु, चरेम) अनुकूल वर्त्तें ॥३॥
Essence
सब मनुष्यों को चाहिये कि वे जैसे अपने लिये उत्तम पदार्थ चाहते हैं, वैसे ही अन्य जनों के लिये भी इच्छा करें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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