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Rigveda Mandal 4 / Sukta 57 / Mantra 2

58 Sukta
8 Mantra
4/57/2
Devata- क्षेत्रपतिः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क्षेत्र॑स्य पते॒ मधू॑मन्तमू॒र्मिं धे॒नुरि॑व॒ पयो॑ अ॒स्मासु॑ धुक्ष्व। म॒धु॒श्चुतं॑ घृ॒तमि॑व॒ सुपू॑तमृ॒तस्य॑ नः॒ पत॑यो मृळयन्तु ॥२॥

क्षेत्र॑स्य । प॒ते॒ । मधु॑ऽमन्तम् । ऊ॒र्मिम् । धे॒नुःऽइ॑व । पयः॑ । अ॒स्मासु॑ । धु॒क्ष्व॒ । म॒धु॒ऽश्चुत॑म् । घृ॒तम्ऽइ॑व । सुऽपू॑तम् । ऋ॒तस्य॑ । नः॒ । पत॑यः । मृ॒ळ॒य॒न्तु॒ ॥

Mantra without Swara
क्षेत्रस्य पते मधूमन्तमूर्मिं धेनुरिव पयो अस्मासु धुक्ष्व। मधुश्चुतं घृतमिव सुपूतमृतस्य नः पतयो मृळयन्तु ॥

क्षेत्रस्य। पते। मधुऽमन्तम्। ऊर्मिम्। धेनुःऽइव। पयः। अस्मासु। धुक्ष्व। मधुऽश्चुतम्। घृतम्ऽइव। सुऽपूतम्। ऋतस्य। नः। पतयः। मृळयन्तु ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (क्षेत्रस्य) अन्न के उत्पन्न होने की आधारभूमि के (पते) स्वामी जैसे (ऋतस्य) सत्य के (पतयः) स्वामी (घृतमिव) घृत के सदृश (मधुश्चुतम्) मधुर आदि गुणों से युक्त (सुपूतम्) उत्तम प्रकार पवित्र विज्ञान को प्राप्त होकर (नः) हम लोगों को (मृळयन्तु) सुख दीजिये तथा (धेनुरिव) गौ के सदृश (मधुमन्तम्) मधुर आदि गुणों से युक्त (ऊर्मिम्) जलधारा और (पयः) दुग्ध को (अस्मासु) हम लोगों में (धुक्ष्व) पूर्ण करो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे बुद्धिमान् खेती करनेवाले जन सुन्दर शुद्ध अन्नों को उत्पन्न करके सब को आनन्द देते हैं, वैसे ही खेती करनेवाले जनों की उत्तम प्रकार रक्षा करके सदा उत्साह युक्त करे ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥