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Rigveda Mandal 4 / Sukta 57 / Mantra 1

58 Sukta
8 Mantra
4/57/1
Devata- क्षेत्रपतिः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
क्षेत्र॑स्य॒ पति॑ना व॒यं हि॒तेने॑व जयामसि। गामश्वं॑ पोषयि॒त्न्वा स नो॑ मृळाती॒दृशे॑ ॥१॥

क्षेत्र॑स्य । पति॑ना । व॒यम् । हि॒तेन॑ऽइव । ज॒या॒म॒सि॒ । गाम् । अस्व॑म् । पो॒ष॒यि॒त्नु । आ । सः । नः॒ । मृ॒ळा॒ति॒ । ई॒दृशे॑ ॥

Mantra without Swara
क्षेत्रस्य पतिना वयं हितेनेव जयामसि। गामश्वं पोषयित्न्वा स नो मृळातीदृशे ॥

क्षेत्रस्य। पतिना। वयम्। हितेनऽइव। जयामसि। गाम्। अश्वम्। पोषयित्नु। आ। सः। नः। मृळाति। ईदृशे ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जिस (क्षेत्रस्य) अन्न की उत्पत्ति के आधारस्थान अर्थात् खेत के (पतिना) स्वामी से (वयम्) हम लोग (हितेनेव) हित की सिद्धि करनेवाली सेना के सदृश (गाम्) पृथिवी (अश्वम्) घोड़ा (पोषयित्नु) और पुष्टि करनेवाले द्रव्य को (जयामसि) जीतते हैं (सः) वह क्षेत्र का स्वामी (ईदृशे) ऐसे में (नः) हम लोगों को (आ, मृळाति) सुख देवें ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे उत्तम प्रकार शिक्षित और अनुरक्त सेना से वीरजन विजय को प्राप्त होते हैं, वैसे ही कृषि अर्थात् खेतीकर्म्म में चतुर जन ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं ॥१॥
Subject
अब आठ ऋचावाले सत्तावनवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में कृषिकर्म को कहते हैं ॥